साहित्य

कंगन

मधु शंखधर ‘स्वतंत्र’

कंगन खनक मोहक रहे ,
सजनी पहन सजना कहे ।
खनखन खनकती चूड़ियाँ,
लगती सुखद यह बेड़ियाँ।।

माता बहन बेटी कभी ,
कंगन पहनती हैं सभी ।
शृंगार सोलह सोभता ,
झंकार कंगन लोभता ।।

कंगन खनक कर यह कहे ,
नाजुक सहेजे जो रहे ।
पाए सभी का प्यार वह ,
मधुमय खनक संसार कह।।

कंगन सजे चूड़ी सजे ,
ताली बजे तो यह बजे।
होती अलंकृत गोरियाँ,
पहने इसे नव छोरियाँ।।

यौवन बसाए हाथ में ,
प्रियतम चले जब साथ में ।
दुल्हन ह्रदय को अति प्रियम ,
इसकी चमक होती शुभम।।

सखियाँ गयीं बाजार जब ,
कंगन खरीदीं नार सब ।
प्रियतम ह्रदय उपहार हो,
कंगन बसा मधु प्यार हो ।।
मधु शंखधर ‘स्वतंत्र’
प्रयागराज
06/05/2022

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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