साहित्य

कितना बदलगया इंसान

शिवम पचाैरी

धरती पर आने से पहले गर्भ का सहारा लिया
उसी गर्भ में रहकर प्रभु को याद किया
जन्मोपरांत लालन-पालन पोषण कराया
अपनी सेवा का कार्य अपनी मात से कराया,

मात ने प्यार किया लाल को सहलाया
बदले में लाल ने मां को ही
लात मार कर घर से भगाया
इंसान ने अपने दिमाग की रचना
को अपनी पीढ़ी को बतलाया,

बदले में पीढ़ी ने भी लात मारकर
पूर्वजों को भी इज्जत का हिसाब बराबर कराया
शिक्षा-दीक्षा लेने गुरु को पटाया
बाद में उसी शिक्षा से गुरु को हड़काया,

बहुत सी ठाेकराें ने इंसान को जीना सिखलाया
परंतु इंसान ने उन्हीं ठाकुरों को खाकर बुलाया
परिणयाेत्सव बाद गृहस्थी ने तन मन धन से साथ निभाया
छोटी सी भूल से ही गृहस्थी को घर से भगाया,

जिंदगी ने इंसान काे जीना सिखलाया
परंतु इंसान ने उन्हीं को ठुकराया
चला सरफिरा इंसान अकेला लड़ने
परन्तु अंत में मौत से ना जीत पाया,

हे इंसान ! अब तो तू सुधर जा
कब तक राक्षसों की तरह
अपना कहर ढ़हायेगा . . . ?
इस धरती पर कभी तो कोई तेरी
इन हरकतों का जवाब देने जरूर आएगा ।।

शिवम पचाैरी
फ़िराेज़ाबाद

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