कहानीसाहित्य

करवट लेती जिंदगी

__वीणा गुप्त

रमा आज बहुत खुश थी। आज उसके  बहू बेटे  शादी के बाद पहली बार घर आ रहे  थे। पहली बार, बात अजीब सी है, लेकिन सच यही था। दर असल  दोनों  बंगलौर में  एक ही आई . टी. कंपनी  में  थे। वहीं प्रेम हो गया और वहीं दोनों  ने  कोर्ट  मैरिज कर ली। बाद में  माता -पिता को सूचना  दे दी। शादी के कुछ फोटो भेज दिए।
  शिखर के पिता और  रमा एक दूसरे  का मुँह देखते खड़े रह गए।उन्हें  बहुत बुरा लगा  । बता देता, तो क्या वो मना कर देते। नहीं। जमाने के बदलते रंग ढंग से वे भी वाकिफ़  थे। इकलौती  संतान के ब्याह को लेकर  उनके सभी अरमान धरे के धरे रह गए।  अब तो इस बात को भी तीन साल  हो गए थे। बाद में  शिखर और सौम्या कंपनी की ओर से ही यू .के .चले गए। माँ -बाप से मिलने भी नहीं आ पाए। रमा और उसके  पति की आर्थिक स्थिति  ठीक थी। शिखर के पिता की सरकारी  पेंशन अच्छी  थी। कोई जिम्मेदारी  नहीं  थी। ऊपर से शिखर भी कुछ न कुछ भेजता ही रहता। पर उन दोनों  को उसके  साथ की जरूरत  थी पैसे की नहीं। पिछले ही साल रमा के  पति कोरोना की चपेट  में  आ चल बसे। सभी विदेशी फ्लाइट्स बंद थीं। शिखर तब भी नहीं  आ पाया। अब रमा अकेली थी। अकेले घर  में  उसका मन नहीं लगता। पर अपने  मिलनसार  सहयोगी स्वभाव के  कारण वह आस
पडो़सियों  से इतना घुल मिल गई  कि अब वह दिन भर व्यस्त  रहती। पडो़स की हर खुशी ,हर गम को अपना समझती। सबका हाथ बँटाती। इसके  बदले में  उसे भरपूर आदर सम्मान  मिलता।  उस दिन जब शिखर ने बताया कि वे  बंगलौर वापिस आ गए हैं और अगले  शनिवार  को घर आ रहे  हैं तो  बेटे-बहू  के आने की खबर ,उसने  सारे महल्ले  में  बताई। सभी को अपने घर आने का न्यौता दिया और उनके स्वागत की तैयारियों में  जुट गई। सभी चादरें,कुशन कवर,परदे बदल डाले। घर को आईने की तरह चमका दिया। शिखर की पसंद की सब्जियां  और फल मंगवा लिए और उसकी  पसंद का भोजन बनाया। उसे एयर पोर्ट से घर लाने का काम उसने शर्मा जी के बेटे विवेक को सौंपा। विवेक ने  हँसकर कहा भी, ” चाची जी। शिखर भैया खुद  आ जाएंगे। आप इतनी टेंशन मत लो।” पर रमा नहीं  मानी। “तुझे कह दिया न कि उन्हें  लाना है, तो तू ही लाएगा, बस।” वह अधिकार से बोली। विवेक मुस्करा  दिया।
  अगले दिन  सुबह सात बजे  फ्लाइट आनी थी। रमा को रात भर नींद नहीं  आई। सुबह चार बजे से उठ गई।  सब काम निबटा लिए।  कभी अदंर ,कभी बाहर जाती रमा को देख,पडोस की शालू बोली,”ताई जी ,आराम से अंदर बैठो। क्यों अपने  को बेकार ही थका रही हो। शिखर भैया अपने घर में ही तो आ रहे  हैं। कोई मेहमान थोड़े ही हैं।” “यह क्या जाने  माँ के दिल की बात,अभी बच्ची ही तो है।” रमा ने मन में  सोचा।
  घंटे भर बाद विवेक अकेला ही आया। घबराई रमा कुछ पूछती कि वह खुद ही बोला, “शिखर और भाभी होटल में चले गए हैं। वहाँ फ्रैश व्रैश होकर ,दोपहर तक आएंगे।तब तक आप भी आराम करो चाची। ”  रमा को विश्वास  नहीं  हुआ। अपना घर होते-साते शिखर होटल चला गया। उसने डाईनिंग टेबल पर, मेहनत से बनाए हुए  बेटे की पसंद के व्यंजनों को देखा और मन मार कर टी .वी. का रिमोट उठाकर, यूँ ही चैनल घुमाने लगी। दोपहर तक का समय काटना उसके  लिए  पहाड़ सा हो गया था।
     आखिर दरवाजे  की बैल बजी।  शिखर और सौम्या  को देखकर वह निहाल हो गई। कितनी खूब सूरत जोड़ी है  दोनों  की। भगवान ,इन्हें किसी की नज़र न लगे। उसने मन ही मन प्रार्थना की। वह मुग्ध हो उन्हें  निहार रही थी कि उसके  पैर छूते हुए शिखर बोला ,”अरे  मम्मा ,अंदर तो आने दो?  या यहीं खडे रखना है।” उसने  सकपका कर दरवाजा   छोडा़ । “हैलो माँ ” सौम्या ने अभिवादन किया।  जीती रहो, दूधो नहाओ, जैसे पुराने आशीर्वाद रमा के होंठों पर आकर अटक गए। ” आओ, बैठो बिटिया।” उसने  कहा। “साॅरी माँ, पिताजी के समय नहीं आ पाया।” ड्राईंग रूम की दीवार पर लगी  पिता की फोटो  को निहारता शिखर बोला। रमा की आँखों में पता नहीं  क्यों आँसू  आ गए। , जिन्हें  उसने  पल्लू से पोंछा और “अभी आती हूँ” कहकर अदर चली गई।
कुछ देर बाद माँ आईं, तो नाश्ते की ट्रे उठाए  पडोस की मेड साथ थी। ” अरे माँ। यह सब क्या ले आईं? हम तो होटल से ब्रेक फास्ट करके ही आए हैं। तुम फॉर्मेलिटी मत करो। ” रमा ने सोचा माँ के  हाथ का बनाया ,मूँग दाल का का हलवा क्या फार्मेलिटी है? “भई ,मुझे कुछ नहीं सुनना। यह सब तो तुम्हें  खाना ही होगा।” पनीर पकौड़ा प्लेट में  परोसती रमा ने अधिकार  से कहा। “और देख ,मैने तेरे लिए हरे धनिए की चटनी भी बनाई है। इसे चटनी बहुत पसंद है।’ बहू की ओर प्लेट बढ़ाती रमा ने  कहा।  सौम्या कभी प्लेट को तो कभी शिखर की ओर देख  रही थी। जो अपने  बढ़ते मोटापे को नज़र अंदाज कर तसल्ली से हलवा खा रहा था।  “बस करो शिखर”  उसने  पति को लताडा़। “तुम्हारी  डायटिंग  चल रही है न?” चटनी में डुबा पकौड़ा खाते खाते शिखर ने उसे  वहीं प्लेट में रख दिया । “एक दिन खा लेने से कुछ नहीं होगा डाईटिंग को।” रमा बोली और सौम्या की ओर देख कर बोली ,”तुम भी लो बिटिया, तुमने  तो कुछ  भी नहीं  लिया। ”  सौम्या ने कोई रिएक्शन  नहीं  दिया। ” यह मार्निंग में केवल फ्रूटस लेती है “शिखर ने पत्नी की ओर से सफाई दी। “शिखर, मैंने तुम्हारे  लिए  राजमा चावल भी—और भी जो खाना चाहो बता देना।फटाफट बना दूँगी।” रमा बोली। तीन-चार साल की खाने पीने की कसर रमा अब पूरा करना चाह रही थी। इन अम्माओं को खाने के सिवा कुछ
नहीं सूझता,सौम्या सोच रही थी।
“अरे मम्मी। हम यहाँ आपसे  मिलने  आए हैं, खाना खाने नहीं।” शेखर ने  सौम्या के तेवर भाँपते हुए कहा। रमा पल भर रुक  कर चाय लाने अंदर चली  गई। चाय पीते हुए शिखर बोला,
“मम्मा अब हम दोनों  यहीं रहेंगे। हमने अब यहीं जॉब ज्वाॅयन कर ली है।” रमा को तो अपने कानों पर विश्वास ही नहीं  हुआ। “यह तो  बहुत  अच्छी  खबर है । कब शिफ्ट कर रहे हो यहाँ ?” उसने उल्लास भरे स्वर में  पूछा। “सामान दो -तीन दिनों तक आ जाएगा। लोड करवा दिया है। हम तब तक कोई  किराए का घर ढूँढ  लेंगे।” ” क्या?  किराए का घर क्यों? यहाँ क्या प्रॉब्लम है? इतना बडा़ घर है। ” उसने  पूछा।  सौम्या तटस्थ बनी खिड़की  से  बाहर देखती रही।। “माँ बात यह है  कि सौम्या फेमिली  वे पर है। उसे यहाँ कम्फर्टेबल नहीं  लगेगा।”  “अरे शिखू! कैसी बात करता है। ऐसी हालत में  तो तुम्हें  यहीं रहना चाहिए। यहाँ तो मैं बहू का पूरा ध्यान रखूँगी। अकेले  नौकरी  और प्रेगनेंसी वह कैसे  संभालेगी? क्यों बिटिया?  सास पर भरोसा तो  है न?” वह लाड़ से बोली।  सौम्या जबरदस्ती मुस्कराई।  “नहीं  माँ,आप से नहीं  होगा । वैसे भी  सौम्या के  पेरेंट्स अब हमारे  साथ ही रहेंगे। सब संभाल लेंगे। आप आराम से यहीं रहिए।” “पर शिखर ! तुम्हारे सास ससुर तो बंगलौर में अपने बेटे-बहु  के साथ रहते हैं न?” रमा  ने पूछा।  जबाब  सौम्या  ने दिया  ,”मम्मा , माँ और भाभी की बिल्कुल  नहीं  बनती। हर समय भाभी, उन्हें टॉर्चर करती हैं। इसलिए अब वो वहाँ नहीं  रहना चाहते। मैंने ही उन्हें  अपने  पास रहने को कहा है।” “तुमने ठीक किया बिटिया।अब जिंदगी  तो गुजारनी ही है। जिसकी जैसे गुजर जाए।” रमा शायद  जिंदगी  जीने का गुर खुद को ही  समझा रही  थी। “अच्छा  अब चलते हैं  माँ। कोई काम हो तो फोन कर देना।अपना ध्यान रखना। बी, पी.की दवाई  रैगुलरली लेती रहना। मैं बीच- बीच में  आपसे  मिलने  आता रहूँगा।” रमा खूब समझ रही थी कि बेटे को उसकी  कितनी चिंता है। “अभी  रुको, दो मिनट” रमा बोली। अंदर जाकर उसने  बहू के लिए  खरीदी कांजीवरम सिल्क की हल्की गुलाबी, जरीदार बॉर्डर की साड़ी और  डायमंड का सेट निकाला, जो उसने और उसके  पति ने अपनी होने वाली बहू के लिए  बड़े चाव से खरीदा था। बस दे ही नहीं  पाए। रमा का मन फिर भर आया। “लो  बिटिया, यह तुम्हारे  लिए” उसने सौम्या को साड़ी और सेट दिया। “कितनी सुंदर  साड़ी है।” शिखर बोला। “पर सौम्या  तो साड़ी  नहीं  पहनती।” सौम्या  ने उसे शिकायती  नजरों  से निहारा और बोली “यह साडी़ तो मैं  जरूर  पहनूँगी। और यह सेट भी कितना प्रिटी है न?” रमा तो गद् गद्  हो गई। “फिर मिलते  हैं” कहकर वे चलने ही लगे थे कि  विवेक आ गया,”यह क्या शिखर भैया, अभी आए,और इतनी जल्दी चल भी दिए।  कुछ दिन तो रुकते चाची के पास। तुम्हारे  साथ- साथ हमें भी चाची के हाथ के छप्पन भोग खाने को मिल जाते। ” वह बोला। “अभी जल्दी है भाई ,फिर आएंगे। ” कहकर वे चले गए। रमा सोफे पर बैठी न जाने  किस सोच में  डूबी थी।विवेक मजे से पनीर पकौड़ा  खा रहा था । जिंदगी कब, क्या करवट ले लेगी ,यह भला कौन जान पाया है।

वीणा गुप्त
नारायणा विहार
नई दिल्ली

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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