साहित्य

करवा चौथ पर भाव मन के

गीता पांडेय अपराजिता

कार्तिक कृष्ण पक्ष चौथ में करवा पूजन बना विधान।
गौरीशंकर गणपति पूजन चंद्र दर्शन को शुभमान।

उपवास रहूंँ मन्नत मांँगूँ हरदम तेरा साथ रहे।
व्रत तोड़ूँ जल पी हाथ तुम्हारेअमृत रस धारा बहे।

जब से तेरा साथ मिला सदा मन में है सुहास रहे।
लगता जीवन मधुरिम इतना ज्यों छाया मधुमास रहे।

अनुराग तुम्हारी सांँसों का तन मन में है भरा हुआ।
बलि बलि जाऊंँ मैं प्रियतम प्रीत प्यार है गहरा हुआ।

तुमसे कभी न रूठूँ मैं तुमसे ही श्रृंगार सजा है।
कभी रूठ यदि जाती हूंँ तो करते मनुहार मजा है।

जनम जनम के साथी हो बनी सुहागन में मर जाऊंँ।
बस यही अभिलाष मेरी हर जन्म मै तेरी कहाऊँ।

सात सुरों के तालों से सज कुसुम कली सा खिलती हूंँ।
अंबर साआच्छाद किए हो बनी तुम्हारी धरती हूंँ।

रोम-रोम पुलकित हो जाता तेरी सुध की छांँवों में।
तेरे दम रचा हुआआज महावर मेरे पाँवों में।

मेहंदी रची हाथों में मांँग सिंदूर से भरी हुई ।
कंगना चूड़ी खनक रहे हैं चुनरी भी है सजी हुई।

प्रभु जी आशीष बना रखना ऐसे जोड़ी बनी रहे।
प्रिय का प्यार सदैव बरसे गीता प्रीत से सनी रहे।

स्वरचित मौलिक व अप्रकाशित रचना
गीता पांडेय अपराजिता रायबरेली उत्तर प्रदेश 94 15718 8838

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