साहित्य

करवा चौथ विशेष

💞 💞
आज के दिन
ये चोरी चुपके तेरा तकना :
भर जाता है अंतस् को
कितने आह्लाद से!

रोजमर्रे की दिनचर्या में
ओझल तुम्हारा नेह!
:छलक- छलक पड़ता है
आज के दिन!

जब तुम कहते हो मुझे :
थोड़ा संँभल कर चलो!

जब आज की रसोई
खुशी – खुशी
संँभाल लेते हो तुम…
बच्चों के संग!
और कोई विशेष फरमाइश
न खुद करते हो!!
और न बच्चों को करने देते हो!!!

और
रोज हल्दी – नमक सने
मेरे एक बालाधारी हाथों को!
… मेहंँदी की खुशबू और
सुहाग :चूड़ियों की
लाली से भरा देखना तो
अभीष्ट ही होता है तुम्हारा
आज के दिन!!

बिछुए में फंँस गए
मेरी कामदार भारी साड़ी के
किसी तार को
कितने अनुराग में भर
हौले से निकाल देते हो
तुम नीचे बैठ!!

पाजेब भरे पांँवों की
पूरे घर में दिनभर गूंँजते
रुनझुन – मृदंग – थाप पर तो
नर्तित हो उठता है
तुम्हारा मन- मयूर!!

मेरे स्वच्छ काले – घुँघराले
धुले लहराते घने केश
और बंकिम भौंहों के बीच
माथे पर दमकती
बाल अरुण रवि- सी
लाल बड़ी सिंदूर – बिंदिया
कैसे देवी – दर्शन की सात्विकता से
भर – भर देती है तुम्हें!!!

मुझसे ज्यादा विकलता से
प्रतीक्षा करते हो तुम
गगन के शुभ्र प्रांगण में
पावन चांँद के निकलने की!
ताकि
अपने हाथों से
जल की प्यार भरी घूँट पिला
दिवस भर की
सौभाग्य – कामना की तपस्या को
दे सको पूर्णता!!

तुम्हारे पौरुष के
रुक्ष नारिकेल – कवच के भीतर
पलता है
कितना मधुर मृदुल प्रेम!
जो अक्षय दीप सा
आजीवन करता रहता है
जीवन के समस्त अंधकार को
दीपित… देदीप्यमान!!!

डॉ पंकजवासिनी

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