साहित्य

करवा चौथ

डॉ अवधेश कुमार ‘अवध’

हे मेरे जीवन की संगिनि तुझे नमन l
तेरे ही सँग भवसागर से करें गमन l
मेरी साँसों से यादों तक तुम ही हो l
तुमसे ही सुरभित है मेरा प्रणय चमन ll

तुमसे ही ये जग सारा तुमसे जीवन l
तुमसे ही सागर हिमगिरि तुमसे कानन l
तुमसे ही है हास हमारे होठों पर l
संग तुम्हारे लगता पतझड़ भी सावन ll

तुम मेरे वंशज की धात्री संवाहक l
गर्मी में शीतलता सर्दी में पावक l
तुम वीणा की सरगम तुम ही शहनाई l
नहीं माँगती हो तुम मुझसे कोई हक ll

मुझे बनाया माथे की बिंदिया लाली l
माँग दर्प सिन्दूर कान कुंडल बाली l
पाव महावर हाथ हिना चपला लगती l
पा मुझको मद से मदमाती मतवाली ll

चाँद रश्मि में पति को देखे शरमाये l
चलनी के ओटन से प्यारी मुसकाये l
कर सोलह श्रृंगार बाट जोहती वो l
चंदा के सँग पति को पाकर हरषाये ll

करवा चौथ प्रिया का पति सँग है अर्पण l
करवा चौथ एक दूजे का है दर्पण l
करवा चौथ काल के मुख पर चाटा है l
करवा चौथ सभी संशय का है तर्पण ll

डॉ अवधेश कुमार ‘अवध’

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