साहित्य

करवा चौथ

डॉ मधुबाला सिन्हा

करवा लेकर द्वार खड़ी मैं
आ जाओ मनमीत सजन
तेरे लिए ही व्रत रखा है
तृप्त करो मनप्रीत सजन
तुझसे ही शुरू खत्म तुझीपे
ओ मेरे बनवारी
राह सवाँरूं सजी धजी मैं
चाँद को आज निहारूँ
वैसे तो तुम रोज चाँद बन
अँगना मेरे आ जाते हो
कभी हँसाते कभी रुलाते
मुझको गले लगा जाते हो
छलनी के जैसे सौ छिद्र हैं
तप्त हृदय के अंदर में
उन्हीं छिद्रों से टक टक ताकूँ
भरे हुए इन नैनों से
प्यासी भूखी व्रत रखूँ मैं
मंगलकामना लेकर सँग
सदा सुहाग का आशीष देना
मझे लगा कर रखना अंग
★★★★★
डॉ मधुबाला सिन्हा
मोतिहारी, चम्पारण

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