लघु कथासाहित्य

कलयुग में नेकी

अंजु दास गीतांजलि

सच ही प्रतित हो रहा था उस वक्त उसे कि इस कलयूग में नेकी करना कितना मंहगा पड़ता है । खासकर के तब जब
सामने वाले से खून का रिश्ता नहीं हो । चारों तरफ़ से कटाक्ष भरे शब्दों के वाण उसके सीने को छलनी कर रहे थे । और उसके आंसू टपक टपक कर उसकी बेबसी का हाल बयां कर रहा था ।।
बार बार उसकी आंखों के सामने वो वक्त आ जा रहा था जिस वक्त बेटी के नामांकन के वक्त पहली बार उदय से उसका परिचय हुआ था । अपनी बेटी को पहली बार अपने से अलग कर रही थी दिपा । लेकिन और कोई रास्ता भी तो नहीं था उसके पास बच्ची के शिक्षा का आखिर सवाल जो था । शहर में घर तो बन ही रहा था लेकिन बच्ची को पढ़ाना भी तो जरूरी था । इसलिए बेटी को होस्टल में छोड़कर कर जाने वक्त बिलख रही थी वो ।
घर आकर ऐसा लगा जैसे बेटी की जुदाई उसकी जान ले लेगी पल पल भाडी लगता था उसे जिस वजह से दिन में अनेकों बार बेटी का हाल जानने के लिए उदय को फोन करती थी वो । उदय कभी बात करवा देता तो कभी खुद इधर उधर की बातें करके फोन रख देता था । बेटी के लिए बैचेनी इतनी अधिक थी कि मां बेटी के बीच की कड़ी उदय
का फोन बन गया था ।
एक दिन अचानक उदय का दिपा का फोन गया बच्चों को रखने में दिक्कत आ गई है , मकान मालिक पुराने घर को तोड़कर नया घर बनवा रहे हैं और खाली करने का दवाब दे रहे हैं ऐसे में बच्चों को लेकर तुरंत कहां जाएं , घर खोजें लेकिन मिल नहीं रहा है क्या करें क्या नहीं समझ में नहीं आ रहा है मुझे अगर बुरा न मानें तो आपके घर की ढलाई हो चुकी है कर्मो नहीं महिने पन्द्रह दिनों के लिए हमें घर दे दे आप ताकि बच्चे लोग सिर्फ रात भर रह सकें ।उदय की तकनीक को जानकर दिपा ने कहां पति से बात करके देखती हूं । पति पत्नी ने आपस में विचार विमर्श कर हामी भर दिए आखिर उन बच्चों में उनके अपने बच्चें भी थे ।
उदय ने दिपा से कहा इस दुख की घड़ी में आप पति-पत्नी ने मेरे स्कूल को टूटने से बचा लिया वैसे भी आपलोग यहां तो रहते नहीं है ।दस पन्द्रह दिन के लिए काम रोक दीजिए अपने घर का जैसे ही हम दूसरे जगह घर ढूंढ लेंगे बच्चों को लेकर वहां सिप्ट कर जाएंगे तब तक हमें आश्रय दीजिए अपने घर पर ।। हामी के बाद वैसे ही चारों तरफ़ खुले घर में बच्चों को लेकर उदय रात में सिर्फ सोने आता और भोर में ही सबको लेकर स्कूल चला जाता था । रोज़ इस तरह से बच्चों को लाना और सुबह-शाम लेकर जाना परेशानी तो उसे भी हो रहा था लेकिन होस्टल के नाम पर तुरंत कोई घर भी तो नहीं दे देता । इस तरह की अपनी परेशानी दिपा से सांझा करता था । लेकिन एक दिन अचानक एक हादसे में उदय की मौत हो गई और उस वक्त भी दिपा से फोन संवाद के कुछ पल बाद ही । उसके बाद तो जैसे दिपा पर पहाड़ टूट गया । फोन पर हमेशा दोनों के संवाद को इतने ग़लत तरीके से लिए जाने लगा कि जैसे वो टूट कर बिखर गई इस हादसे ने उसे कही का नही छोड़ा ।
लेकिन उस घड़ी में भी उसे समझने वाला उसके पति के अलावे उसके साथ कोई भी खड़ा नहीं था ।
औरत और मर्द होने की वजह से दिपा और उदय के रिस्ते को ही लोग ग़लत ठहराने लगें थे ।
दिपा को उस वक्त लग रहा था इस अपमान को सहने के बजाय खुदकुशी कर ले वो । लेकिन उसके पति ने दिपा का हाथ थामे रखा उस दुःख की घड़ी में और बार बार एक ही बात उसे समझाते रहे अगर हम ग़लत नहीं तो हमें किसी से भी डरने की जरूरत नहीं है हम लड़ेंगे बस तुम हिम्मत रखों।
अरे जब हम सभी उस शख्स से बातचीत करते थे जब हमने उसके दुखों में उसका साथ दिया है तो ईश्वर हमारे साथ बुरा नहीं कर सकता है ।
लेकिन दिपा को उस वक्त रह रह कर जक ही बात दिमाग में आ रही थी कि अगर इस कलयुग में ईश्वर होता तो आज़ शरिफों की शराफत पर ही अंगुली नहीं उठता और न ही नेकी करने का सिला इस तरह से उसे और उसके परिवार को मिलता जो आज़ उसे मिल रहा है ।
लेखिका_ अंजु दास गीतांजलि पूर्णियां बिहार ।

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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