साहित्य

कवि अतुल कुमार की रचनाएं

अपने शिल्पी बनते हैं।।

वो ही लोग सूरज की तरह
नील अम्बर पर चमकते हैं,
जो हवाओं के साथ
अपनी दिशा नही बदलते हैं।।

जो हर परिस्थिति में अडिग
रहते है, वो ही शोला बन धधकते हैं
बादल उनका कुछ नही कर सकते
वो सितारा बन चमकते हैं।।

जो सच्चाई की राह पर चल
कर, खुद ऊंचे मकसद पाने निकलते है,
वो वक्त को अपनी तरह से चलाते हैं
न की वक्त के अनुसार ढलते हैं।।

जो चट्टानों को चीर कर निकलते है
बड़ी बड़ी बाधाएं देख डरते नहीं,
वो नदियाँ की तरह बहते है,ठहरे
हुए पानी की तरह सड़ते नही।।

जो जितनी बार भी गिरे
फिर उठकर होंसले से खड़े होते हैं,
वो, आलस्य के गुलाम नही बनते
उनमें मेहनत के मोती जड़े होते है।।

जो समंदर में डूब कर
मोती और सीपियाँ चुनते है
हम भी ठोस संकल्पों को ले कर
आओ खुद अपने शिल्पी बनते हैं।।

उड़ने की कीमत जानता है।।

जिसने रात का धोर तमस देखा हो,
भोर की रोशनी की कीमत जानता है,
जिसे तीव्र भूख लगी हो,
भोजन की कीमत वही जानता है।।

जिसके नंगे पाँव में काँटे चुभे हो,
वो ही जूते की कीमत जनता है,
जो ठंड में सिकुड़ रहा हो
वो ही रजाई की कीमत जानता है।।

जिसकी गाड़ी कुछ क्षण पहले
छूटी हो, समय की कीमत जानता है,
जिसने फ़टे वस्त्र पहन कर देखे हो
कपड़ों की कीमत जानता है।।

जो काम की तलाश में भटक रहा हो
रोजगार की कीमत जानता है,
जो श्रम कर बहुत थक गया हो
वो ही,आराम की कीमत जानता है।।

जिसका हर पल आँसुओं से सामना हो
वही असली हँसी की कीमत जानता है,
जो रहता है, सडक के किनारे पर
वो ही ,घर की कीमत जानता है।।

जिसने सही हो गुलामी की यातनाएँ,
वो ही आजादी का सुख जानता है,
काट दिया गया हो जिसका पर
वो परिंदा ही उड़ने की कीमत जानता है।।

मेरे बचपन की अठन्नी।।

पहले मिलती थी दस्सी,
फिर मिलती थी चवन्नी,
बजट बनाना पड़ता था,
जब मिलती थी अठन्नी।

घर के छोटे छोटे काम,
हम झट से निपटा जाते थे,
तब कँही जा कर हम
पिता जी से अठन्नी पाते थे।।

अठन्नी मिलते ही,यारों
सारा बाजार घूम आते थे,
महंगी टॉफी,चॉकलेट का रेट,
पूछ पूछ लाला जी को सताते थे।

सेमिया,ईमली,गुडचने,
हम मजे से मिलकर खाते थे,
और अठन्नी में से भी,देखो
कुछ पैसे बचा लाते थे।।

वो समय था उस अठन्नी,
में भी बरकत इतनी होती थी,
कोई लालच मन मे न आती
आराम से अखियाँ सोती थी।

जब जब अठन्नी की तुलना
जग की दौलत से की जाएगी,
बचपन की अठन्नी की कीमत
हर बार ज्यादा ही आएगी।।

तुम हो मेरी पहली और आखिरी आशा।।

तुम जानती हो, जब भी मैं दुःखी होता हूँ,
दिन भर चिंता में रहता हूँ, नही चैन से सोता हूँ।

सब मुझे देख कर, मेरा उपहास उड़ाते हैं,
मेरे दर्द को देख, लोग मेरा सन्ताप बढ़ाते है।।

ऐसे में जब तुम , मेरा उत्साह बढ़ाती हो,
मुझे प्रेरित कर, मुश्किल से लड़ना सिखाती हो।

मेरी हर हार को जीत में बदल जाती हो,
हर पल हर क्षण मेरा हौसला बढ़ाती हो,

मुझे वास्तविकता से लड़ना सिखाती हो,
जब टूटने लगता हूँ, प्यार से जोड़ जाती हो।।

तुम मेरी सच्ची मीत,मेरे सुख की परिभाषा हो
तुम मेरी पहली और आखिरी आशा हो।।

अतुल कुमार
गड़खल
जिला सोलन।।

                   
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