साहित्य

कवि कमलाकर त्रिपाठी की कलम से

यथार्थ

सोचो अपनी आज की बातें,
कल की हो जाती पुरानी,
बीता समय कहाँ ही आता,
नआती फिर बचपन-जवानी,
नआती फिर बचपन-जवानी,
यथार्थ यही है हर कोई सोचो,
कहते ‘कमलाकर’ हैं सदैव ,
जियो औ वर्तमानकी सोचो।।

मनोवृत्ति

जब मनोवृत्ति न हो अन्यथा,
बातें मन की मानना चाहिए,
नित रहे ध्यान सकारात्मक,
तदर्थ यथोचित लगाना चाहिए,
तदर्थ यथोचित लगाना चाहिए,
है होता ललित – फलित तब,
कहते ‘कमलाकर’ हैं मन में,
विकृत भाव न रहे जब।।

स्वर्गिकसुख

सुख – संतोष में है स्वर्गिकसुख,
है अच्छे कर्म – भाग्यसे मिलता,
यह है शुभकार्य का सरस फल,
जीवन सुखी-प्रफुल्लित रहता,
जीवन सुखी- प्रफुल्लित रहता,
है सुख-संतोष में सुख ही सुख,
कहते ‘कमलाकर’ हैं सच है,
आत्मतुष्टि में है स्वर्गिकसुख।।

महान

सफल वही है अपने जीवनमें,
जो रखता सबसे प्रेमव्यवहार,
औ श्रम-सेवा है श्रमविंदु बहाता,
रखता सादा जीवन उच्चविचार,
रखता सादा जीवन उच्चविचार,
है होता नहीं वो कभी विफल,
कहते ‘कमलाकर’ हैं जग में,
वही महान है समर्थ – सफल ।।

गुरु-कृपा

कभी गुरु-कृपासे मिलता नहीं,
हमें धन – विषयसुख – अभिमान,
है गुरु – कृपासे मिलता हमें,
विनय – ज्ञान, मान – सम्मान,
विनय – ज्ञान, मान – सम्मान,
हैं अतिदूर रहते त्रयताप सभी,
कहते ‘कमलाकर’ हैं गुरु-कृपासे,
भय-भ्रम-अज्ञान न रहता कभी।।

कविता

माँ शारदे! की अनुकंपा से,
है भाव-विचार का होता उद्गार,
तब लेखनी चलती है कवि की,
औ कविता बनती है रसधार,
कविता बनती है रसधार,
जब कृपादृष्टि रखतीं हैं माँ!
कहते ‘कमलाकर’ हैं शाश्वत,
हृदयस्थ रहतीं हैं शारदे माँ!!

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