साहित्य

कुम्हार और मिट्टी

पूनम शर्मा स्नेहिल

माटी के हर कण को संजो,
नव आकार बनाता है ।

वो कुम्हार है जो माटी की,
कीमत को बढ़ाता है ।

चुनकर कंकण उसमें से वो,
क‌ई रूप सजाता है ।

सोचो ना जो तुम कभी ,
वो ऐसा कर जाता है।

कच्ची माटी से अपने वो ,
सपने सजाता है ।

कभी घड़ा तो कभी कुम्हार,
दीपक बनाता है ।

दीपों की जगमग से घर सबका ,
रौशन कर जाता है ।

कभी रूप दे ईश्वर का ,
जिसका हर कण पूजा जाता है।

कठिन परिश्रम और लगन से,
वो नहीं घबराता है ।

मट्टी से बनकर मिल जाना ,
मिट्टी में वो हमें सिखाता है।

मिट्टी के हर कण से वो,
कई रुप बनाता है ।

कच्ची मिट्टी से अपने वो,
पक्के सपने सजाता है ।

कुम्हार और दीये का ,
क‌ई जन्मों का नाता है।

एक दूजे से मिलकर ही वो,
एक दूजे का मान बढ़ाता है ।।

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