कवितासाहित्य

“क्यों!आज भी मैं ‘अबला’ ही रही”


मैं स्वावलंबी,मैं शिक्षित पढ़ लिख के मैं डॉक्टर बनी,
पैर पर खड़े हो कर अपने,माता-पिता का गौरव बनी।
निकली थी काम से शाम को दरिंदों के हाथों जा फंसी,
चार हैवानों के हवस का शिकार बनकर मैं कुचली गई,
गाड़ी सहित जली,जलते समाज की’प्रियंका रेड्डी’ बनी।

पढ़ना था कुछ बनना था,मुझे तभी घर से बाहर गई,
बेरहम छह हैवानों के हाथों कुचली और मसली गई,
अंग- अंग कुचला गया मेरा,दरिंदो को दया नही आई,
दस दिनों तक कठोर पीड़ा में तड़प कर के मैं मारी गई,
मौत से पहले जिसे’जल’भीना मिला मैं वही निर्भया बनी।

मैं गाँव में लुटी,शहर में लुटी,हर कस्बों और नगरों में लुटी,
कभी खेत,कभी झाड़ में,कभी राजनीति के आड़ में लुटी,
अपने ही रक्षक पति के हाथों लुट कर मैं ही फुलंदेवी बनी
मंदिर के भीतर भी मैं ‘हाय’! ढोंगी साधुओं से ना बच पाई,
रक्षा ले जिसके शरण गई,उसी रामरहिम का शिकार बनी।

बाइसवीं सदी पे जन्म लेकर अब भी मैं अबला ही रही,
कभी निर्भया,कभी लक्ष्मी,कभी प्रियंका बन कर के जली,
कभी रूप के दीवानों के ‘एसिड अटैक’ का शिकार बनी,
ख़बरों के सुर्खियों में कभी लक्ष्मी अग्रवाल बनकर लड़ी,
भूखे दरिंदो के हाथों से मैं’मासूम उम्र’में भी शिकार बनी।
©हेमा

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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