कवितासाहित्य

क्यों नारी बेचैन

__सत्यवान ‘सौरभ’
रिसर्च स्कॉलर, कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट

नारी मूरत प्यार की, ममता का भंडार ।
सेवा को सुख मानती, बांटे खूब दुलार ।।

अपना सब कुछ त्याग के, हरती नारी पीर ।
फिर क्यों आँखों में भरा, आज उसी के नीर ।।

रोज कहीं पर लुट रही, अस्मत है बेहाल ।
खूब मना नारी दिवस, गुजर गया फिर साल ।।

थानों में जब रेप हो, लूट रहे दरबार ।
तब ‘सौरभ’ नारी दिवस, लगता है बेकार ।।

सिसक रही हैं बेटियां, ले परदे की ओट ।
गलती करे समाज है, मढ़ते उस पर खोट ।।

नहीं सुरक्षित आबरू, क्या दिन हो क्या रात ।
काँप रहें हम देखकर, कैसे ये हालात ।।

महक उठे कैसे भला, बेला आधी रात ।
मसल रहे हैवान जो, पल-पल उसका गात ।।

जरा सोच कर देखिये, किसकी है ये देन ।
अपने ही घर में दिखे, क्यों नारी बेचैन ।।

रोज कराहें घण्टियाँ, बिलखे रोज अजान ।
लुटती नारी द्वार पर, चुप बैठे भगवान ।।

नारी तन को बेचती, ये है कैसा दौर ।
मूरत अब वो प्यार की, दिखती है कुछ और ।।

नई सुबह से कामना, करिये बारम्बार ।
हर बच्ची बेख़ौफ़ हो, पाये नारी प्यार ।।
(सत्यवान ‘सौरभ’ के चर्चित दोहा संग्रह ‘तितली है खामोश’ से। )

सत्यवान ‘सौरभ’
रिसर्च स्कॉलर, कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,

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कुमार संदीप

अध्यापक सह लेखक । निवास स्थान- सिमरा(मुजफ्फरपुर) बिहार । विभिन्न साहित्यक पत्र पत्रिकाओं में निरंतर रचना प्रकाशन । कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित । वर्तमान में ग्रामीण परिवेश में अध्यापन कार्य सहित दि ग्राम टुडे मासिक व साप्ताहिक ई पत्रिका के अलंकरण का कार्य।

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