कवितासाहित्य

क्षमादान

__भूपेश प्रताप सिंह


तिराहे पर जूता गाँठता मोची
सभी को गंदा दिखता है।
बाबू के पंजों को बचाने वाला
क्यों गंदा लगता है?
वह मेहनती है कर्मशील है
सिर पर तिरछी लटक रही छतरी
सूरज को चुनौती है।
पॉलिश के रंगों से सनी हथेली
चमड़े को आकार देती हथेली
मौन हो धागे को खींचती उँगलियाँ
एक साथ उठती हैं नमस्कार को ।
गरीब की इस सरलता पर
साहब को शर्म आती है
यह अभिवादन ,शान में गुस्ताखी है।
शायद वह नहीं पढ़ सका
स्कूल गया होगा वह भी कभी
पीछे बैठा दिया गया होगा
मास्टर ने नई बिरादरी बना दी होगी।
गरीब हुआ तो मोची बन गया।
आज इसकी आँख में कीचड़ है
लेकिन हाथ मैले हैं साहब !
इससे पहले कि आपका जूता
उलटा गाँठ दे,इसका हक लौटा दो
देर तो बहुत हो चुकी है
फिर भी गरीब है यह
आपको ज़रूर माफ़ कर देगा।

कवि, संपादक एवं समीक्षक
भूपेश प्रताप सिंह
पट्टी प्रतापगढ़ , उत्तर प्रदेश

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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