कवितासाहित्य

खुशबू

__मधु शंखधर ‘स्वतंत्र’

खुशबू अपने पन की ऐसी , जीवन मधुमय वह कर जाए ।
भाँति – भाँति के पुष्प समाहित , खुशबू हिय को बहुत लुभाए ।।

आज मिली पाती प्रियतम की , जिसमें पिय संदेशा आया ।
एक पुष्प था सूखा उसमें , जो अंतर्मन आन समाया।
दूर देश में बैठा साथी , खुशबू शाश्वत मिलन कराए ।
खुशबू अपने पन की ऐसी…..।।

सीमा पर बैठा जो प्रहरी , माटी को वह तन पर धारे ।
अपने मिट्टी की खुशबू से , नव ऊर्जा से राष्ट्र सँवारें ।।
देह त्याग कर भाव समर्पण , खुशबू से खुशबू मिलवाए।
खुशबू अपनेपन की ऐसी……।।

खुशबू पूर्वज की जिस गृह में , उस गृह में उन्नति है आती।
मात – पिता आशीष साथ ही , अमृत सरस वर्षा करवाती ।
बंधन रिश्तों का पलाश सम , स्वर्णिम खुशबू जो फैलाए।
खुशबू अपने पन की ऐसी…..।।

खुशबू धरती और गगन की , प्रकृति सुशोभित गाथा गाती।
हिन्द देश की खुशबू मिलकर , सत्यमेव जयते बन जाती ।
जन- गण – मन फूलों की माला , भारत माँ शृंगार कराए।
खुशबू अपनेपन की ऐसी…..।।


मधु शंखधर ‘स्वतंत्र’
प्रयागराज

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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