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खुशी से जी गया

बिमल काका गोलछा “हँसमुख”

हंसकर दर्द छुपाया मैने, अब रोकर दिल बहलाता हूँ,
जख्म मुझे मेरे अपनों ने दिए, फिर भी सहलाता हूं।
घाव अभी तक भरे नहीं, सब दिन मरहम लगाता हूं,
घाव दिलों में कैसे लगते, ये दिल की बात बताता हूं।।

दिल दिया जिस यौवनता को, आज वो पीर पराई है,
जहां तलक उस छोर तक, हर दिन प्रीत निभाई है।
वफा, कसम, वादे, सब तस्वीर इस दिल में समाई है,
छोड़ सका ना उस चाह को, क्यों ये मति भरमाई है।।

आंसू के कतरो में देखो, खुन बनके पानी पूरा बह गया।
आज भी इस युग मैं जिन्दा हूं, दर्द अपनो का सह गया।
घाव उसने मुझको दिए, अमृत समझकर सब पी गया,
जीना क्या जीना, फिर भी “हँसमुख” खुशी से जी गया।।

बिमल काका गोलछा “हँसमुख”
श्रीडूंगरगढ़ (बीकानेर) राजस्थान

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कुमार संदीप

अध्यापक सह लेखक । निवास स्थान- सिमरा(मुजफ्फरपुर) बिहार । विभिन्न साहित्यक पत्र पत्रिकाओं में निरंतर रचना प्रकाशन । कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित । वर्तमान में ग्रामीण परिवेश में अध्यापन कार्य सहित दि ग्राम टुडे मासिक व साप्ताहिक ई पत्रिका के अलंकरण का कार्य।

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