कवितासाहित्य

गर्मी

__मधु शंखधर ‘स्वतंत्र

गर्मी बढ़ी है आज कल ,
होता तपन से मन विकल।
तपती धरा दिन – रैन है ,
आए कहीं क्या चैन है ।।

जब सूर्य पारा है चढ़े ,
गर्मी धरा की तब बढ़े।
यह चैत्र से मिलती गले ,
संबंध हो कम दिन ढ़ले ।।

सरदी गयी गर्मी भई ,
हैं रूप प्रकृति के कई।
मुखड़ा छिपाए सब अभी ,
बच्चे बड़े बूढ़े सभी ।।

सुख चैन मिलता छाँव में,
पीपल व बरगद गाँव में ।
शहरों में बढ़ता ताप है ,
जैसे मिला अभिशाप है ।।

चलती बहुत लू तेज है ,
मरते बहुत अंग्रेज है ।
नाजुक स्वयं को मानते ,
गर्मी सहन कब जानते ।।

बचना अगर है ताप से ,
पौधे लगाओ माप से।
बनना प्रकृति रक्षित सभी ,
गर्मी लगे मधुमय तभी ।।


मधु शंखधर ‘स्वतंत्र’
प्रयागराज

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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