साहित्य

ग़ज़ल कैसे हो पूरी

किरण झा


ग़ज़ल कैसे हो पूरी
अभी कुछ शेर है बांकि
गा रही सरगम में मैं
मगर अभी शेर है बांकि

हर तरफ नज़्मों के मेले
हुए मेरे गीत अकेले
कैसे पूरा कर पाऊं
जिंदगी में हैं झमेले
क़लम थम सी गई है
मगर उम्मीद है बांकि

ग़ज़ल कैसे हो पूरी
अभी कुछ शेर है बांकि

लफ्ज़ बिखरे पड़े हैं
अपनी जिद में अड़े हैं
जितनी मैं पास जाऊं
उतनी वो दूर खड़े हैं
बागबां बन ना पाऊं
मगर अभी आस है बांकि

ग़ज़ल कैसे हो पूरी
अभी कुछ शेर है बांकि

लगे रचना अधूरी
होती कहां ये पूरी
ठहरी क़लम कह रही
ठहरना बहुत जरूरी है
सांस थमने लगी है
मगर रफ्तार है बांकि

ग़ज़ल कैसे हो पूरी
अभी कुछ शेर है बांकि

शब्द ख़ामोश हैं मेरे
कहां कुछ कह सकते हैं
एक निगाह जो डालो
ग़ज़ल ये बन सकते हैं
ढल रहा सूरज देखो
“किरण” पूरी रात है बांकि
ग़ज़ल कैसे हो पूरी
अभी कुछ शेर है बांकि

किरण झा, स्वरचित
लयबद्ध

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