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ग़ज़ल

__शेख रहमत अली बस्तवी
बस्ती (उ, प्र,)

वह दिखते हैं सीधे-सरल व्यौहार से।
है तेज़ चलती जिनकी ज़ुबा तलवार से।।

गाज़ इक दिन उन पे भी गिर जायेगा।
बच नहीं सकते ख़ुदा की मार से ।।

हम ढूंढते हैं शम्मा-ऐं लेकर जिन्हें ।
वो आजकल ग़ुम चल रहे इतवार से।।

मौन होकर हर किसी को छल रहे जो।
ज़ालिम से अब क्या बात करना प्यार से।।

भले हो सवालों की झड़ी वो सोंचते हैं।
छूट जायेगा जान इक इनकार से।।

हल छिपा है प्यार की बोली में “रहमत”।
मिलने वाला कुछ नहीं तक़रार से।।

शेख रहमत अली बस्तवी
बस्ती (उ, प्र,)

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कुमार संदीप

अध्यापक सह लेखक । निवास स्थान- सिमरा(मुजफ्फरपुर) बिहार । विभिन्न साहित्यक पत्र पत्रिकाओं में निरंतर रचना प्रकाशन । कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित । वर्तमान में ग्रामीण परिवेश में अध्यापन कार्य सहित दि ग्राम टुडे मासिक व साप्ताहिक ई पत्रिका के अलंकरण का कार्य।

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