साहित्य

ग़ज़ल

सुनीता जौहरी

जानें क्यूं आज भुलाएं गम याद आए
गुजरतें वक्त में गैरों के करम याद आए ।

कहीं किसी मोड़ पर शायद हम मिलेंगे
बिछड़तें वक्त हुई आंखें नम याद आएं ।

आदत हो गई जख्मों के साथ रहने की
लगानें को दिएं वो तेरें मरहम याद आए ।

किस्सें प्रेम के जो लिखने बैठी आज मैं
क्या कहें कि यहां भी हमें सनम याद आए ।

नहीं फर्क अंधेरों में उजालों में ‘सुनीता’ को

घनघोर काली अमावस में हमदम याद आएं ।।

© सुनीता जौहरी
वाराणसी उत्तर प्रदेश
स्वरचित व मौलिक

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