साहित्य

गाँव-गलियारों का खूबसूरत अहसास कराती है,”अभी उम्मीद बाकी है” की ग़ज़लें-डॉ.रामावतार सागर

__डॉ.रामावतार सागर
कोटा, राजस्थान


“अभी उम्मीद बाकी है’ वरिष्ठ ग़ज़लकार रामनायण ‘हलधर’ की लेखनी से सृजित ग़ज़लों का वह गुलदस्ता है जिसमें उनकी102 ग़ज़लें संकलित हैं।आकशवाणी कोटा में वरिष्ठ उद्घोषक रामनारायण’हलधर’ न केवल सुमधुर आवाज के धनी है, वरन् श्रेष्ठ दोहाकार-गीतकार के साथ-साथ समकालीन ग़ज़ल के भी सशक्त हस्ताक्षर हैं।”अभी उम्मीद बाकी है” हलधर जी का पहला ग़ज़ल संग्रह है,लेकिन उनका लेखन लगभग तीन दशक पुराना है।किसी भी लेखक की वरिष्ठता का पता उसके प्रकाशित संग्रह से नहीं बल्कि उसकी सक्रियता से लगता है।इस मायने में हलधर जी की साहित्यिक सक्रियता का अनुभव काफ़ी पुराना है।जहाँ तक मैं जानता हूँ हलधर जी के गीत,ग़ज़ल और दोहे,कोटा के ही वरन् राष्ट्रीय स्तर पर श्रोताओं और पाठकों के बीच अपनी जगह बना चुके है।उनके दोहे कितने ही सहृदयों के कंठाहार हैं,तो उनकी ग़ज़लों के शे’र कितने ही चाहने वालों की आवाज़ बनकर प्रकट होते हैं।उनके संवेदनाओं से परिपूर्ण गीत मंचों पर न केवल तालियाँ बटोरते हैं वरन् अलसुबह अख़बार की हेडलाइन बनकर ध्वनित होते हैं।
“अभी उम्मीद बाकी है” ग़ज़ल संग्रह की भूमिका समकालीन ग़ज़ल के वरिष्ठ शायर,प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सम्मानित व्यक्तित्व आलोक श्रीवास्तव ने लिखी है, तो उस पर अभिमत कोटा के वरिष्ठ साहित्यकार अरविंद सोरल ने दिया है। इस संग्रह की ‘अपनी बात’ कागज़ का वो टुकड़ा भी प्रकाशित है जिसे सम्मानित ग़ज़लगो बशीर बद्र ने हलधर जी की डायरी पर अपने हाथ से लिखा था।बशीर बद्र साहब ने कागज़ के उस टुकड़े पर लिखा था ‘रामनारायण मीणा के लिए दुआएँ के ये ग़ज़ल में खुद को तलाश सकें।’ तब से लेकर आज तक ग़ज़लों में खुद को तलाशने का उनका सफ़र बदस्तूर जारी है। खुद को तलाशने में उनकी ग़ज़लें इतनी तराशी गई कि इस दौर की सभी महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई। कई ग़ज़ल विशेषांकों में उनको साभार प्रकाशित किया गया। अभी हाल में ही डॉ. विनय मिश्र के संपादन में प्रकाशित ‘संवदिया’ पत्रिका के ग़ज़ल विशेषांक में भी उनकी ग़ज़लें इस दौर के सुप्रसिद्ध ग़ज़लकारों के साथ प्रकाशित हैं।
ग़ज़ल संग्रह की पहली ग़ज़ल की रदीफ जोकि इस पुस्तक का शीर्षक भी है
“झुकेगा नफरतों का सर अभी उम्मीद बाकी है भरोसा उल्फत ऊपर कर अभी उम्मीद बाकी है”1
सांप्रदायिक संवेदना से उपजी यह ग़ज़ल आशान्वित है कि हमें आपसी सद्भाव और भाईचारे पर भरोसा कायम रखना चाहिए। इस ग़ज़ल का एक शेर तो इतना मकबूल हुआ कि उसे सद्भावना के परिंदों ने परचम की तरह चारों ओर फहराया है और वह शेर है-
“दिवाली की सजावट को,घरों पे ईद तक रक्खा
किसी मासूम की जिद पर,अभी उम्मीद बाकी है”2

दरअसल रामनारायण हलधर संभावनाओं के ग़ज़लकार हैं,अंतिम सांस तक भी आशा को नहीं छोड़ने वाले संवेदनशील रचनाकार है उन्होंने आस दामन इतनी मजबूती से पकड़ रखा है कि उनकी ग़ज़लों का यह सबसे पसंदीदा स्वर बन गया है।
“मेरे खेतों को अभिशाप अकालों का
सावन बरसे वरदानी तो ग़ज़लें हों”3
“अलावों पर मुसीबत की मुसलसल मावठें बरसी
मगर इस राख में उम्मीद का शोला दबा सा है”4 “तेरी उम्मीद के पदचिन्ह होते
मेरा फिर रास्ता आसान होता”5
“इसी उम्मीद मैं हर साल महँगे बीज बोते हैं कलेजा बादलों का भी फटेगा देखना एक दिन”6
“मेरी तकदीर का सहरा युगों से राह तकता है
न जाने किस जगह उम्मीद का बादल बरसता है”7
” नदी ने उम्र भर उम्मीद के पुल टूटते देखें
कई बरसात के नाले यहां भी है वहां भी हैं”8 “लाख अंधेरों में भी उम्मीदों का दीपक जलता है
रावण की लंका में अब भी एक विभीषण बैठा है”9 जैसे शेर रचने वाले हलधर की ग़ज़लें एक उम्मीद पैदा करती है कि आने वाले सालों में ही सही बिगड़ा हुआ सांप्रदायिक माहौल सद्भाव ठीक होगा और मानवता बची रहेगी। रामनारायण हलधर उम्मीद के इस दामन को इसलिए भी नहीं छोड़ते क्योंकि कहा जाता है कि ‘उम्मीद पर दुनिया कायम है’ इसी मोहब्बत को दुनियां में कायम रखने के लिए वह अपनी ग़ज़लों में इतनी शिद्दत से उम्मीद को शामिल करते हैं की आलोक श्रीवास्तव को भी अपनी भूमिका में लिखना पड़ा-“ऐसे समय में जब किताबों से हमारा रिश्ता जड़ों से काटने की कोशिशें जारी है हलधर जी अपनी ग़जलों को सौंधे-सौंधे कागजों की पैरहन पहनाकर,खूबसूरत किताब की पालकी में बिठाकर, पाठकों तक पहुँचाना चाहते हैं, इसके पीछे उनकी सकारात्मक सोच ही है।”10
रामनारायण हलधर गांव की पृष्ठभूमि से आते हैं इसलिए उनके चिंतन में गांव के सुख-दुख और हंसी-खुशी तो ‌‌ शामिल है ही आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति से प्रस्यूत बाजारवादी प्रभाव जो गांव को लीलते जा रहे हैं पर भी उनकी कलम खूब चलती है गांव सिर्फ उनके चिंतन में ही नहीं बल्कि उनके अंतर्मन में बसता है इसलिए इस विषय पर वे डूब कर शेर लिखते हैं जैसे-
“थकी पगडंडियों को देख के मासूमियत चहकी
मजूरी से घरों को गांव,वापस लौटता सा है”11 “वजीफा कौन देता है हमें हम गांव वाले हैं हमारा इल्म केवल ढाई आखर वर्णमाला है”12 “अभी कुछ गांव वाले हैं
विरासत को संभाले हैं”13
“हमारा खेत होता था महा खलियान होता था जरा से गांव में कितना बड़ा सम्मान होता था”14
“वह हमारे गांव नदिया खेतवाड़ी छीन कर पत्थरों का शहर यह इस्पात का जंगल दिया”15 “दूर से देखा सभी ने गांव को
कोई तो नजदीक जाकर देखते”16
”गांव से चिट्ठियां नहीं आती
इत्र की शीशी या नहीं आती”17
मैं कितनी ही जुबाने सीख लूं
पर यह लहजा गांव का जाता नहीं है”18
किताबें गांव पर भी लिख रहे हैं
जिन्होंने गांव तक देखा नहीं है”19
“गांव है फुटपाथ से भी बेदखल
शहर को तो छत मिली आंगन मिला”20
“गांव था फूलों के जैसे लोग थे
आजकल किस्से कहानी हो गया”21 रामनारायण हलदधर जी ने एक पूरी ग़ज़ल ही गांव की रदीफ़ पर लिखी है जो इस प्रकार है-
“जोड़े से नहीं जुड़ते गांव।
इस दर्जा अब टूटे गांव।
उतरन उतरन से त्योहार ,
कतरन कतरन सपने गांव।
बाहर से सरसों के फूल
भीतर भूखे बच्चे गांव
देख पुराने निकले आज
सत्ता के परखच्चे गांव।
बाबुल का भोलापन और
मां की ममता जैसे गांव”22
ये कुछ शेर हैं जो हलधर जी ने गांव की जमीन पर लिखे हैं लेकिन आधुनिकता की कोख से जन्मा यह शेर लाजवाब है कि-
“फोन करके कभी पूछ ले गांव का हाल कैसा हुआ
अपनी सरसों ओगी के नहीं खाद पानी का क्या क्या हुआ”23
गांव के साथ खेती बाड़ी का संबंध अटूट है। गांव में किसान वैसे ही है जैसे शहर में मजदूर। गरीबी,अभाव और दुखों को अपनी किस्मत मानकर भी जमीन को नहीं छोड़ना,आधुनिकता के परिणाम स्वरूप खेती की जमीनों पर भू माफिया की तीखी नजर,मौसम की बेरुखी आदि कई विषयों पर हलधर जी ने खूबसूरत शेर कहे हैं।
“तुम्हारे खेत में सरसों शगुन के गीत गाएगी घटाओं से हमें हलधर अभी उम्मीद बाकी है”24 “मेरे खेतों को अभिशाप अकालों का
सावन बरसे वरदानी तो ग़ज़लें हो”25
“अभी भू माफिया की बद्नजर से दूर है ‘हलधर’ तुम्हारा खेत औ खलिहान तू तकदीरवाला है”26
“सूद के अवशेष हैं बिखरे पड़े हलधर अभी
कर्ज लेकर फिर बुवाई खेत में करने लगा”27 “सहोदर कर्ज में डूबे हुए हैं
मैं अपना हक किसी दिन मांगता पर”28
“जब भी खेतों में अच्छी फसल हो गई
यूँ समझिए हमारी ग़ज़ल हो गई
हाथ धनिया की लाडो के पीले हुए
साधना होरायों की सफल हो गई”29
“जमीं के बेतहाशा भाव बढ़ते जा रहे हैं
घरों में रंजीत से अलगाव बढ़ते जा रहे हैं”30
“डरो मत कर्ज लेकर मर गए तो
हमारी पीढ़ियां गिरवी पड़ी है”31
“अभावों की विरासत के ह्रदय में बीज बोते हैं हमारे खेत में फसलें ग़ज़ल तब लहललाती है”32
ग़ज़लकार रामनारायण हलधर की ग़ज़लें प्रगतिशील और जनवादी सोच की ग़ज़लें हैं। आम आदमी के दुख दर्द से उपजी उनकी ग़ज़लें बुद्धिजीवी वर्ग को सोचने पर मज़बूर करती है। उनके कई शेर दिलों पर सीधे दस्तक देते हैं।उन अनखुले किवाड़ों को खोलने के लिए जो सदियों से आज तक नहीं खुले।कर्ज के बोझ से दबे किसान हो चाहे अनावृष्टि या अतिवृष्टि के मारे किसान,भू माफिया के शिकंजे में आए किसान हो चाहे,सूदखोर साहूकार के गिरफ्त में फंसे किसान सभी का चित्रण उन्होंने बेबाकी के साथ किया है।उनकी ग़ज़लों पर चर्चा करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार अरविंद सोरल लिखते हैं कि-“हलधर खाँटी देहाती किसान हैं।एक ग्रामीण किसान होने की चेतना उनमें निरंतर है।उनकी कविता को इसी चेतना का वेग जनरेट करता है।खेत-खलिहान, किसान और उसके जीवन के दुख-दर्द जितनी मात्रा में हलधर के यहाँ है,ग़ज़ल में संभवतः और कहीं नहीं होंगे।”33 हलधर ने ग्रामीण जीवन को बहुत नजदीक से देखा समझा है। खेती किसानी में कर्ज किस बला का नाम है,वे बखूबी जानते हैं। इसलिए किसान के साथ कर्ज के अटूट रिश्ते पर उन्होंने कई मूल्यवान शेर लिखें उदाहरणार्थ “सूद के अवशेष हैं बिखरे पड़े हलधर अभी
कर्ज लेकर फिर बुवाई खेत में करने लगा”34
तेरे बचपन के साथी कई कर्ज में डूब कर मर गए जो बचे है उन्हें सूद का दिन-ब-दिन अस्थमा सा हुआ” 35
“कर्ज में डूब रहा है हलदर
हाथ से दूर किनारा जाए”36
“कहां तक खुदकुशी हलदर करेगा
किसी के पास भी उत्तर नहीं है”37
“कहां तक खुदकुशी करें हम
हमें अब खेतियों से डर लगे हैं “38
हलधर की ग़ज़लों में राजनीतिक व्यवस्था और उससे उत्पन्न विषमताओं की पड़ताल भी खूब देखने को मिलती है। राजनीतिक नारे खूब उछाले जाते हैं, लेकिन आम आदमी के अरमान फिर भी कुचले जाते हैं इसे हलधर जी खूब जानते हैं और इसीलिए लिखते भी हैं-
“हाल पर हलधर तेरे सरकार अब गंभीर है खुदकुशी की पंचवर्षीय योजना पर बल दिया”39
“पुरानी साईकिल की हम मरम्मत को तरसते हैं हमारे गांव का सरपंच नित कारें बदलता है”40 ”हमारी झोपड़ी के आस का दीपक बुझाती है सियासत चांद सूरज के हमें सपने दिखाती है’41
हलधर जी की ग़ज़लों में अमीरी-गरीबी,जाति- धर्म,व्यवस्था-विषमता के साथ-साथ ग़ज़ल की रूमानियत भी जिंदा है।उनके सीने में भी एक धड़कता था दिल है जो ग़ज़ल के शेर भी कहना जानता है।दौरे जहां की फिक्र के साथ-साथ अपने महबूब से गुफ्तगू करना भी हलधर जी नहीं भूलते-
“हिना का रंग उनके हाथ में यूँ ही नहीं महका सुबह से शाम तक हमने रसोईघर संभाला है”42
“आपका जिक्र फिर छेड़ा जैसे
सांस में मोगरा घुला जैसे
अजनबी आशना सा लगे कोई
रूह ने रूह को छुआ जैसे”43
“कोई पाजेब सी बजी छत पर
रात भर चांदनी हंसी छत पर”44
सभी जानते हैं कि ‘हलधर’ शायर रामनारायण मीणा का तख़ल्लुस है।आमतौर पर शायर ग़ज़ल के मक़ते में अपने तख़ल्लुस का प्रयोग करते हैं, तभी वह मक़ते का शे’र कहा जाता है।हलधर जी ने भी अपने तख़ल्लुस ‘हलधर’ का सार्थक और साभिप्राय प्रयोग किया है।
“तुम्हारे खेत में सरसों शगुन के गीत गाएगी घटाओं से हमें हलधर अभी उम्मीद बाकी है”45
“अभी भू माफिया की बद्नजर से दूर है ‘हलधर’ तुम्हारा खेत औ खलिहान तू तकदीरवाला है”46
“सूद के अवशेष हैं बिखरे पड़े हलधर अभी
कर्ज लेकर फिर बुवाई खेत में करने लगा”47
“हमारा बादलों से भी भरोसा उठ गया ‘हलधर’
मरुस्थल ही मरुस्थल है,यही अपना मुकद्दर है”48
“कौन चाहेगा जमीं को इस कदर
खुदकुशी करते अगर ‘हलधर’गए”49
हलधर की ग़ज़लों की भाषा आम बोलचाल की भाषा है,जिसमें प्रतीकों और बिंबों का खूबसूरत प्रयोग हुआ है।ग़ज़लों की ज़मीन पर हलधर ने खेती-किसानी का नया मुहावरा रचा जो दूर तक ध्वनित होता है।हलधर की ग़ज़लों पर अपना अभिमत लिखते हुए वरिष्ठ साहित्यकार अरविंद सोरल लिखते है कि- “रामनारायण हलधर के पास वह विशिष्ट प्रबोध है।वे चाहे जितनी बोलचाल की उर्दू अपनी भाषा में जोड़े,उनकी ग़ज़लों का गोत्र नहीं बदलता।”50 यह संकलन ग़ज़ल के पाठकों के बीच बहुत लोकप्रिय है।इसकी लोकप्रियता की बानगी इस कदर देखने को मिलती है कि संग्रह की कई ग़ज़लों को गायकों ने अपनी सुमधुर आवाज़ में गाया है।यह संग्रह लोकप्रियता के नये आयाम स्थापित करेगा, इसी भरोसे के साथ मैं रामनारायण ‘हलधर’ को बहुत-बहुत बधाइयाँ देता हूँ।उनकी ग़ज़लों का यह खूबसूरत सफ़र यूँ ही जारी रहे।


डॉ.रामावतार सागर
कोटा, राजस्थान

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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