लघु कथासाहित्य

घंटा विशेषज्ञ

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© भुवनेश्वर चौरसिया “भुनेश”

विशेषज्ञ डाक्टरों की फीस जनरल फिजिशियन से कुछ ज्यादा होती है।
एक बार छगन बीमार हुआ तो उसे प्राइवेट सहित कई सरकारी अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़े लेकिन उसकी बीमारी ठीक न हुई।
एक बार फिर किसी विशेषज्ञ डाक्टर को अपनी बीमारी के सिलसिले में मिलने गया।
पहले डॉक्टर ने उससे पूर्व दिखाई गई पर्चियां मांगी तथा देखने के बाद कुछ दवाएं लिखी और कहा कोई खास बीमारी नहीं है आप जल्दी ठीक हो जाएंगे।
छगन को दवाई खाते महीने बीत गए।
दवा की समाप्ति के बाद पुनः उस विशेषज्ञ डाक्टर के सामने था।
डाक्टर जी कुछ आराम हुआ,छगन नहीं डाक्टर साहब।
विशेषज्ञ डॉक्टर ने पुनः कुछ और दवाईयां लिख दी और कहा-मैं ने कुछ अच्छी दवाईयां लिखी है उसे खाने के बाद आप इस बार जरूर ठीक हो जाएंगे।
छगन तो क्या? डाक्टर साहब आपने इससे पहले घटिया दवाई लिखी थी जो मैं अब तक ठीक नहीं हुआ फिर आप काहे का विशेषज्ञ डाक्टर हैं।
डाक्टर छगन को अपनी आंखें लाल पीले करते हुए देखने लगा।
छगन पर्ची पकड़ अपनी राह नापते बरबराते चल रहा था एक बीमारी तो ठीक न हुई अब तक और अपने आप को विशेषज्ञ डॉक्टर कहते हैं।
घंटा विशेषज्ञ इससे अच्छा तो मैं अपने गांव वाले कम्पाउन्डर से ही दवाई न ले लेता।
© भुवनेश्वर चौरसिया “भुनेश”

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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