कवितासाहित्य

घर का सुख

__डॉ रामशंकर चंचल

सिर पर
लकड़ियां की गठरी
पीठ पर मासूम बच्ची
चल देती हैं वह
ऊंची पहाड़ी से रोज़
पेट की खातिर
एक लंबा। कंकरीला
रास्ता तय कर
शहर के बीच
शहर
जहां धूरती है
शैतानी आंखे
उसकी गरीबी से झांकते
नव यौवन को
और वह
उसे नज़र अंदाज कर
चलती रहती हैं
बेधड़क
स्वाभिमान से
दर दर भटकने के बाद
बे मुश्किल बिक पाती हैं
उसकी लकड़ी
उसके आंके मूल्य की
आधी कीमत में
उसी अर्थ से
नमक और मिर्च ले
निकल पड़ती है
शहर से अपने घर
अपने परिवार के बीच
घर जो टिका है
चार खम्बो पर
लकड़ी और कवेलू के
चंद टुकड़ों पर
जहां पहुंच
महसूस करती है
वह एक
अजीब सुख सुकून
अपने परिवार के
बीच
आत्मीक आनंद और
सुखद अहसास


डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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