कवितासाहित्य

चलते- चलते

किस मुँह से कहें श्रम दिवस की शुभकामनाएँ, डिग्निटी ऑफ लेबर यहाँ नहीं है, यहाँ तो मजदूर की हालत देखकर लगता है चुल्लू भर में डूब मरना चाहिए और मजदूर कहता है ।

__डा. पुष्पलता मुजफ्फरनगर

शातिर घाघ बिकाऊ
बहरूपिये चल निकाल अन्टी से
एक दिन की कमाई
बातों के गुब्बारे उड़ा रहा है
मेरे आंसुओं की बरसात
बना रहा है
मेरे बच्चों के लिए
मेरे लिए
मैं काफी हूँ
तेरी तरह मुफ्त में नहीं
बकता
आयोजकों की बड़ाई में
खोखले पुल नहीं बांधता
मजूरी लेता हूँ
हर काम की
ठोककर
हाँ मजदूर हूँ पर
तुझसे कम मजबूर हूँ
तेरी तरह आँसू नहीं बेचता
किसी के
चेहरा नहीं लगाता
झूठे दर्द का
मुखौटा नहीं पहनता हमदर्दी का
रहने दे बस
एक कप चाय नहीं दे सकता तू मुझे
जिस अमीर की निंदा में
गढ़ता है शब्द जाल
वही देगा मुझे मजदूरी भी
और बिस्कुट भी चाय के साथ
और तुझे इस शब्दजाल की कीमत का
कागज भी
मुझे दया आती है तुझ पर
मैं मुफ्त में नहीं करता काम
तू तो मुफ्त में दे आता है
अपनी कमाई


डा. पुष्पलता मुजफ्फरनगर

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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