साहित्य

चलो आज हम इसे मिटाएं

पंडित राकेश मालवीय मुस्कान

हर मन में इक रावण रहता, हर मन में इक राम।
बुरो बुराई रावण करता, भलो भलाई राम।
झूठ मूठ रावण को जाले, पाले मन में राम।
जीवन भर चलता रहता है, मन में ये संग्राम।।
चलो आज हम इसे मिटाएं, ताप सहाता चाम।
दशकंधर के बंदर बनकर, करे न कोई काम।।
विजयी होगा राम हमेशा,विजयी सारे काम।
विजयश्री नभ तक जाएगी, विजयी मन का राम।।
जगह जगह रावण जब पलते, पीड़ित होते राम।
दृढ़ता से ही मार भगाए, करके नित संग्राम।।
दीप दीप सब राम कहेंगे, दीप दीप मन राम।
दीप दीप से लौ प्रकाश की, दीप दीप अभिराम।।
अच्छे और बुरे का मन में, चलता है संग्राम।
विजयी हो जाने वाला ही, कहलाता है राम।।
भ्रष्टाचारी खून न पीता, शोषण का अतिकाम।
कुंभकरण की नींद न सोता, तब होता श्री राम।।
दूजे का जो हक मारेगा,नहीं बनेगा राम।
अंतर्मन में अब तुम खोजो, कहां तुम्हारा राम?
शबरी अरु निषाद वानर संग, जंगल में श्रीराम।
पाहन को भी छू लेने पर, आ जाते हैं प्राण।।

पंडित राकेश मालवीय मुस्कान
प्रयागराज 16

नोट… मैं घोषणा करता हूं कि मेरी रचना मौलिक, अप्रकाशित व पटल के लिए ही सुरक्षित है।

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