साहित्य

चलो जरा इक नया हिंदुस्तान बसाएं

राजेश श्रीवास्तव राज

चलो जरा इक नया हिंदुस्तान बसाएं।
न सरहदें बनाएं न यहाँ दीवारें बनाएं।
कहीं रोटी और कहीं सिवइया खाएं।
जहां चौपाई, सबद और ग़ज़ल सुनाएं।

चलो जरा इक नया हिंदुस्तान बसाएं ।
जहां बेवा, यतीम कोई भी न होने पाए।
ऐसा खंजर और गोली कभी न बनाएं।
साकल बिन दरवाजा हर घर में लगाएं।

चलो जरा इक नया हिंदुस्तान बसाएं।
जहां लंगर, भंडारे, वलीमा खिलाएं ।
बेटे, बेटियां हो सुरक्षित वह घर बनाए।
ऐसी तामील, शिक्षा घर-घर में दिलवाए।

चलो जरा इक नया हिंदुस्तान बसाएं।
ढोल, तबला, सारंगी, शहनाई बजाएं।
गीत ठुमरी के, राग मल्हार कोई गाएँ।
शब ए मुशायरा से महफिलें भी सजाएं।

चलो जरा इक नया हिंदुस्तान बसाएं।
फिर से अब कोई शहादत होने न पांए।
रिश्ते उनके यहां फिर बिखरने न पांए।
तिरंगा किसी कफन से लिपटने न पांए।

चलो जरा इक नया हिंदुस्तान बसाएं ।
सियासती तख्त से खुद को बचाएं।
खुशियाँ बांटने का तरीका आजमाएं।
इंसानियत हो सबमें यही राज़ बताएं।

@राजेश श्रीवास्तव राज
मौलिक रचना

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