साहित्य

चलो जलायें मन का रावन

माला अज्ञात

सदियां बीती हर वर्ष जलाते
हम पुतला रावन का
चलो जलायें मन का रावन
मिटे अँधेरा अंतर्मन का

जिनकी बातों से बू आये
आतंकवाद औ गद्दारी की
करें प्रदूषित राम की धरती
दें दुहाई सहिष्णुता की
इनके मंन्तव्यों को समझें
उचित समय आ गया मनन का
चलो जलायें मन का रावन
मिटे अँधेरा अंतर्मन का

सत्य वो सूरज है कि जिसको
निगल सके न कोई ग्रहण
हर मन से निकलेंगे राम
धरती जब कर लेगी प्रण
उठे गदा अंतर समझाने
साम दाम और दण्ड भेद का
चलो जलायें मन का रावन
मिटे अँधेरा अंतर्मन का

खुलेआम घूमें अब रावन
आज खुली सड़कों पर
भयभीत रहे हरपल ही सीता
काटे गये जटायु के पर
छलते आज भी नारी को तुम
पहन मुखौटा राम नाम का
चलो जलायें मन का रावन
मिटे अँधेरा अंतर्मन का

भाई ने हड़पी भाई की दौलत
कभी कर दिया बेघर घर से
ज्ञानी हो गये पढ़पढ़ पोथी
लेकिन दंभ गया न मन से
बात विभीषण की न माने
ढू़ढ़ उपाय वश में करने का
चलो जलायें मन का रावन
मिटे अँधेरा अंतर्मन का

सजा सजा ऊँचे मंचों को
बैठे सब मिल होकर एक
मेघनाद से बेटे पाले
निभा रहे रावन की टेक
साधु सन्यासी सी जनता
भोगे फल वोटर होने का
चलो जलायें मन का रावन
मिटे अँधेरा अंतर्मन का

पहले हरघर बाँचें रामायण
पढायें मर्यादा का पाठ
मन के राम को जागृत करलो
लौटें रामराज्य के ठाट
हावी न हो पश्चिम संस्कृति
मान रखें लक्ष्मण रेखा का
चलो जलायें मन का रावन
मिटे अँधेरा अंतर्मन का

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