साहित्य

चाँद को देख चाँदनी घबराई

चाँद तुझे देखना तुमसे घण्टो प्यार करना अच्छा लगता था
तेरा दीदार कर तुमको तकना भी सच सच्चा लगता था
दूध में नहाई हुई सी थोड़ी थोड़ी सी तुम घबराई हुई सी
मेरे करीब तुम आई थी मोहनी अद्दा देख कर मैं भी थोड़ी शरमाई थी

पंद्रह दिन पूर्ण कर पूर्णिमा बन शरद पूर्णिमा तुम कहलाये
अपनी दूध सी छँटा बिखरे धरती पर वो आसमाँ से आये
धरती की प्यास बुझाने ख़ुशियों की सौगात सजाने
रिमझिम सी तारो संग अपनी प्यारी बारात लेकर मेरी जिंदगी में आये

मेरे लिये स्वप्न संग आँचल में भर कर प्रतिबिम्ब स्वरूप लाये थे
अपनो संग प्यार से मिलने आसमाँ से धरती भी खूब सजाये थे
पेड़ पौधे हरियाली तेरी छटा थी उसपर निराली
मैंने तुमको हर सांस में पाया तुमको ही सपनो के सागर में समाया

जब भी तुमको निगाहों से छत पर देखा करते थे
सच तेरी खूबसूरत छटा की प्यास मन मे रखा करते थे
गोल से मुखड़ा सुनहरा बदन उसपर तेरा यौवन सा निखार
आकर सिमट गई तुम मुझमें लगे शरद सी पूर्णिमा का प्यार

लाल चुनरियाँ आँखों मे काजल चेहरा तेरा चमकता जैसे चाँद
लेकर तेरी मधुर मुस्कान होठो पर जगाती खुशियाँ साथ
कर सिंगार जब जब आई चाँद को देख चाँदनी घूँघट में सरमाई
तेरी हर अद्दा पर मिट गई सिमट के रह गई दुनियाँ सारी

चाँद तेरा प्यार चाँदनी को भी निर्मल सीतल कर गई
अपने प्यार की चुभन से ख़ुशियों के नव गीत भर गई

कुमारी मंजू मानस
बिहार शिक्षक
छपरा सारण

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