साहित्य

जग उजियारा

नरेश सिंह नयाल

दीप जले हैं सब दिशा,
कौन किसे ढूंढे आज भला,
मिल लो गले जो मिल जाए,
दीपों का यह पर्व सफल हो जाए,

मिले जो भी मुँह मीठा कर देना,
मिठास जरा जुबां पर भी घोल देना,
रह जाए फिर वह मीठा ही,
कुछ ऐसा कह कर तुम देना,

शोर होगा चारों तरफ,
प्रदूषण भी खूब फैलेगा,
तो जेबें भरी रहने देना,
रंगोली पुष्पों से घर सजाकर,
तुम लक्ष्मी का स्वागत करना,

पड़ोसियों के गेट पर,
ताला न तुम लगने देना,
जाकर उनको साहस देना,
हम हैं ना को यथार्थ कर आना,

फिर पूजन सृजन कर लेना,
सार्थक फलित होगी अर्चना,
तुम मन शुद्ध करके अपना,
बैर कलेश सब मिटा देना,
ईश्वर के चरणों में नतमस्तक होकर,
इस दिवाली ऐसी भी,
शुरुआत तुम कर लेना।

©नरेश सिंह नयाल
देहरदून ,उत्तराखंड

(यह मेरी स्वरचित और मौलिक अप्रकाशित रचना है)

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