कवितासाहित्य

जन्नत माँ के क़दमों की धूल

__शेख रहमत अली “बस्तवी”

जब मैंने बोलना सीखा था,
मेरे होंठों पे पहला शब्द माँ था।

आँखों के आँसू अपनी आँखों में समा लेने वाली,
अपने होठों की हँसी हम पर लुटा देने वाली।

दुनिया की तपिश से मुझको बचा लेने वाली,
जब मैं मासूम था अपनी आँचल में छुपा लेने वाली।

मेरे मस्तक पर माँ ने प्यार से हाथ घुमाया है,
बचपन में माँ ने ही तो मुझे चलना सिखाया है।

कभी मुश्किल में हो साथ सदा माँ होती है,
अपने बच्चों के हर दर्द की दवा माँ होती है।

माँ के अटूट रिश्ते से मुझको फरिश्ता होना है,
माँ के सीने से लिपट कर फ़िरसे बच्चा होना है।

ख़ुशी हो या ग़म माँ मुझे तेरा ही अहसास है,
मेरी हर सांस तेरे “रहमत” का मोहताज़ है।

माँ तेरा स्नेह ये ममता की फूल है,
जन्नत भी माँ तेरे क़दमों की धूल है।

शेख रहमत अली “बस्तवी”
बस्ती उ, प्र, (भारत)

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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