साहित्य

जलाओ खुशियों के दीपक


नीमा शर्मा ‘ हँसमुख ‘


जलाओं खुशियों के दीपक
प्रभु वनवास से आये ।
मनाओ आज दिवाली
प्रभु वनवास से आये ॥
खुशी नगर मे है छाई
खुशी घर भर मे छाई है ।
मनाओं आज दीवाली
मेरे श्री राम आये है । ।
ना उन सा पुत्र है जग में
लखन सा देखा ना भाई ।
किया था त्याग सब सुख का
बात वचनो की थी आई ॥
पिता की आज्ञा लेकर
तड़फती कौशल्या माई ॥
पिता का किया वचन पूरा
दिया जो कैकयी माई ।
राम वनवास को जाये
भरत को राज गददी दिलाई ।
किया था पूरा वचनों को
चले राम जब वन को
संग सीता लखन भाई ।
निभाई रीत रघुकुल का
विजय सत्य पर पाई ॥
जलाओं दीप खुशियों – – – – – —
चौदह वर्ष बीते है
आयोध्या खुशियां है छाई ।
सजा लो घर को सब अपने
पधारे राम रघुराई
दीप जलते है खुशियों के
झड़ी आँसू की लगाई ।
बिछाकर पुष्प नेह के
खड़े शत्रुघन भरत भाई ॥
रीत रघुकुल से आई
मनाओं खुशियां तुम भाई
खुशी मे बाजे शहनाई
घर घर वांटे मिठाई ।
जलाओ खुशियों के दीपक — — — –
स्वरचित मौलिक

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