साहित्य

जागो अवनि …

नीलम द्विवेदी

जागो अवनि फैला उजास,
पूरब से आने लगा प्रकाश,
युग युग से छाया अँधकार,
मन के अंदर लाया विकार,
पलक झपकते बदला संसार,
तपते तन ने पा लिया तुषार,
सूने मुखड़े पर मंजू का वास,
ज्योति कलश चमका आकाश,
उतरी वामिका भूमि पर आज,
लावण्या का यह अंश निहार,
सम्पूर्ण सृष्टि अब हुई निहाल,
सहस्त्र दीपिका सा तेज लिए,
सूर्य चन्द्र माता के माथ सजे,
मृगनयनी के दोनों नैन कटार,
हैं कितने अमोघ उनके प्रहार,
लक्ष्मी ,दुर्गा का लेती अवतार,
माता भक्तों पर बरसाए प्यार,
शुभ्रत किरणों का हुआ पसार,
धरा अमितेश का करे आभार,
तनु तृप्त हुआ है पीकर पीयूष,
निर्बल मानव भी बना संजीत,
सौम्य सुहानी सी ऋतु आयी,
पद्मिनीयों ने खुशबू बिखराई,
जीवितेश की अनुपम कृति सा,
नीलम बन चमक रहा आकाश,
शंखनाद की श्रुति से हो विभोर,
भक्ति भाव से हो चेतन जड़ मन,
सब शत शत नमन करें अवनीश,
हो गर्वित खुद पर मुस्काई अवनी।

नीलम द्विवेदी
रायपुर , छत्तीसगढ़।

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