कवितासाहित्य

जिंदगी अगर किताब होती

__प्रेम बजाज ©®

होती ग़र ज़िंदगी एक किताब सुनहरे उसमें ख्वाब लिखता,
करके दूर गमों को खुशियों के मैं उसमें रंग भरता,
ना लिखता जुदाई कभी नसीब में किसी की, मिलन उसमें बेहिसाब लिखता।

होती ग़र ज़िंदगी एक किताब तो लिखता चैन और अमन और खुशियां बेहिसाब लिखता,
ना लुटती इज्जत किसी की ना चेहरा किसी का तेजाब से जलता,
ना जलती कोई बहु दहेज के लालचियों के हाथों,
ना बारात लौटती किसी बेटी की ना किसी बाप की यूं सरेआम पगड़ी उछाल जाती,
ना कोई बिन ब्याही बेटी मां बनती ना कोई अजन्मी बेटी मारी जाती।

होती ग़र ज़िंदगी एक किताब तो किसी मजलूम पर ना होता जुल्म कोई,
ना वृद्धाश्रम, ना अनाथ आश्रम लिखता, ना भाई, भाई
का खून करता, ना मात पिता का तिरस्कार लिखता,
ना लड़ता कोई धर्म के नाम पर, ना जात-पात के नाम पर कोई झगड़ा करता,
बस इंसानियत का ही मैं एक मजहब लिखता।

प्रेम बजाज ©®
जगाधरी ( यमुनानगर)

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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