साहित्य

जीवन और जगतकी सच्चाईओं का अहसास है-निगाहों में बसा सावन

__डॉ. आदित्य कुमार गुप्ता


‘निगाहों में बसा सावन’,डॉ.रामावतार सागर का सद्य:प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह है। डॉ. रामवतार सागर हाड़ौती के लब्ध प्रतिष्ठ ग़ज़लकार हैं । आपका यह प्रथम ग़ज़ल संग्रह है । ग़ज़लों के अतिरिक्त अतुकान्त कविता एवं कथा के क्षेत्र में भी आपने लेखनी चलाई है । यह कृति मानवीय जीवन की विविध आकांक्षाओं और आशाओं की सुनहरी यवनिका पर जीवन संघर्षों के साथ- साथ प्रेम की रसभरी बहारों की बरसात से तन मन गीला करती हुई निगाहों में सावन की तरह छा जाती है। संसार की आपाधापी और संघर्षों की तपती धूप के बीच मनुष्य को ऐसे लहराते काले घने बादलों की छाया की जरूरत होती है जहाँ की सुखद शीतल बयार में कुछ क्षण बैठ कर तसल्ली का अनुभव कर सके । इसीलिए ग़जलकार बड़े विश्वास से लिखता है-‘जुल्फों की घनी शाम मेरे नाम कर दो ना। प्यासा हूं जमाने से ,कोई आरजू नहीं है। मदमस्त लोगों के जाम मेरे नाम कर दो ना।’ लेखक ने दुनियां की विचित्रता और वैविध्य के चित्र बड़ी बेबाकी से अनेक ग़ज़लों में चित्रित किये हैंं। जीवन – संघर्ष के विविध चौराहों को ग़ज़लकार ने बड़ी नजदीकी से देखा है,जहाँ जिन्दगी मुकम्मल रास्ते के लिए नज़र दौड़ाये निहारती रहती है और रास्ते सामने से निकल जाते हैं, यही कारण है कि ग़ज़ल के प्रत्येक शेर में जीवन का गहरा अनुभव बोलता दिखाई देता है -” भूख रोटी के निवालों तक नहीं पँहुची । ये खबर पाँवों के छालों तक नहीं पँहुची ।” मनुष्य संसार में आकर बहुत से स्वप्न देखता है, बहुत कुछ प्राप्त करना चाहता है,पर लाख कोशिश करने पर भी कभी-कभार हाथ खाली ही रहता है ,या हम जो चाहते हैं, वह नहीं मिलता । ग़ज़लकार ने लिखा है–” कहीं भी कोई फूल तो मेरे लिए खिला नहीं । जिसे मैं चाहता था वो कभी मुझे मिला नहीं ।”लेखक को जीवन की विविध स्थितियों ,परिस्थितियों, बिडम्बनाओं और जटिलताओं का गहरा अनुभव है ।ऐसा लगता है,समाज की कटु वास्ततविकताओं का ग़जलकार ने न केवल साक्षात्कार किया है, अपितु उनसे टकराया भी है, इसीलिए तो वह लिखता है-‘बसा के दिल में जिसे हमने रखा ऐ! सागर ,वह दर्द अहले ज़माना क़िताब में ढूंढे’। पर क़िताबे कब दिल का दर्द बयां कर पाई हैंं? वे तो दर्द के अहसास के द्वार खोल देती हैं और मानव अपनी भाव भूमि के सागर में से जिंदगी के मोती बारबार गोता लगाकर तलाशने लगता है और जिंदगी अपने ख्वाबों में आहिस्ता -आहिस्ता सुनहरा संसार देखने लगती है ,लेकिन क्या ख्वाबों की हँसी चेहरे पर मुस्कान ला सकी है ? ग़जलकार इस सत्य से परिचित है । वह लिखता है – “ख्वाब सागर जिसके देखे थे कभी तुमने । वो हँसी अब तक ख्यालों तक नहीं पहुंची।”
मनुष्य का जीवन पेट भरने की जुगाड़ में कब ढलने तक पहुंच जाता है , यह पता ही नहीं चलता और जब पता चल भी जाता है, तब तक देर हो चुकी होती है। यही तो वह सत्य है जिसे कोई झुठला नहीं सकता। आँँखें खुलते ही इस सत्य से मनुष्य का साक्षात्कार होता है -‘”होते ही सुबह हम चल दिए शहर की तरफ। अब होगी शाम ढलने तलक काम की तलाश में ।”यह काम की तलाश जीवन में अनवरत चलती रहती है, यह आवश्यक नहीं है, यह तलाश समय पर पूरी हो जाये।-” इन हाथों को आज तलक काम की तलाश है।” लेखक के ग़ज़लों का कैनवास व्यापक है इसमें आम आदमी की जिंदगी और जगत के व्यवहार से संबंधित अनेक पहलू समाहित हैं ।ग़ज़लकार बढ़ी तल्खी से समस्याएं उठाता है और अपने नजरिए से उनके समाधान खोजता है।यह संसार सागर है,मनुष्य गरीबी से,रोजी-रोटी के लिए संघर्ष करता है, तो कोई सहानुभूति नहीं दिखाता, कोई बात नहीं पूछता,लेकिन वही जब तसल्ली से दो जून की रोटी खाने लगता है, रोजी – रोटी कमाने लगता है तो वह लोगों की चर्चा का विषय बन जाता है, सागर साहब लिखते हैं- “ठोकरेंं लगती हुई तो देखी दुनियां ने नहीं,कार में बैठा तो चर्चा हर जुबानी हो गया ।। आधुनिक प्रगतिशील समाज में आज भी कहीं -कहीं परम्परायें,रूढ़ियाँँ,जाति, भाषा,धार्मिक आडम्बर आदि विकास के मार्ग पर दीवार बनकर खड़े हुई हैं। हमें खुले आसमान तक पँहुचने के लिए इन दीवारों को गिराना पड़ेगा-” खड़ी हैं दीवारें गिरानी पड़ेगीं ,जमाने को सुंदर बनाने से पहले ।”
आज विश्व में स्थितियाँ तेजी से बदल रहींं । गरीब और अधिक गरीब होता जा रहा है, अमीर संसाधनोंं के बल और अधिक अमीर होता जा रहा है । गरीबों के नाम पर राजनीति बहुत होती है, नारे बहुत लगाये जाते हैं ,पर गरीब,गरीब ही बना रहता है रोजी-रोटी के लिए उसके संघर्ष मेंं कमी नहीं आती। सागर साहब तंज कसते हुए लिखते हैं-लाजिमी थी भीड़ रोटी के लिए,भीड़ में नारे पकाये जायेंगे ।” वायुयानों से होते रहे दौरे, कोई भूख से मरा क्या पता होगा।”स्थितियाँ बड़ी विचित्र हैं-कहीं पर उजड़ते हैंं खेत यारों, कहीं बँगला बनाया जा रहा है ।” कोरोना महामारी ने समस्त विश्व को झकझोर दिया हैं। सत्ता, धन-दौलत, ताकत के अहं ध्वस्त कर दिये हैं । मानवीय रिश्तों की हकीकत सामने आ गयी है । लाशों के ढेर मेंं जिन्दगी चार-चार आँसू रोई है ।महामारी ने गरीब , अमीर सभी को अपने आगोश में समेटा है। लाखों लोग असमय काल के गाल में समा गये, लाखों को रोजी रोटी से हाथ धोना पड़ा है ।कई परिवार पूरे के पूरे उजड़ गये हैं ।एक जागरुक साहित्यकार की तरह डॉ. सागर इस त्रासदी की भयावहता को लक्ष्य कर लिखते हैं-एक महामारी के आगे विश्व लाचार है। अब घरों में ही रहें ये आज की दरकार है । बाज़ार तो हैं सारे अब लॉकडाऊन में। मुश्किल हो रही है मयकशी कभी कभी।”भौतिकतावादी चकाचौंध एवं अधिक से अधिक धनसंग्रह की बलवती लालसा ने आपसी मानवीय सम्बंधों को धराशायी कर दिया है । यदि आपके पास पैसा नहीं, तो आपसे कोई भी बात करना पसंद नहीं करता है और न ही किसी तरह का व्यवहार बनाकर रखना चाहता है,संसार की इस कटु सच्चाई को लक्ष्य कर डॉ. सागर लिखते हैं—
-“आज अपने पास में पैसा नहीं । इसलिए तो कोई भी अपना नहीं । लेखक में संसार की विषमताओं, जीवन की विसंगतियों का तीव्र बोध है, यही कारण है , कि उसकी प्रत्येक हलचल पर नज़र है-“कहीं पर उजड़ते खेत यारों, कहीं बंगला बनाया जा रहा है । हवाओं को सिखाया जा रहा है। किसी का घर जलाया जा रहा है ।” कहना यह है ‘निगाहों में बसा सावन’ ग़ज़ल संग्रह जीवन और समाज की विभिन्न परिस्थितियों, क्रियाकलापों का यथार्थ चित्रण कर पाठकों के समक्ष एक बोलती तस्वीर प्रस्तुत करता है । लेखक ने मानव जीवन-जगत से जुड़े अनेक विषयों — गरीबी, अमीरी, प्यार, भूख , रोजी-रोटी, धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य, बरसात, जुल्फ़, रिश्ता,सावन आदि-पर लिखा है। भाषा संप्रेषणीय, सुबोध, सहज और आकर्षक है । फारसी, उर्दू के प्रचलित शब्दों एवं मुहावरों का प्रयोग अच्छा है । पर शैली में कहीं-कहीं शैथिल्य है,सामासिकता का अभाव है,पर रचना सामाजिक सरोकारों के लिए प्रतिबद्ध है । मनुष्य समाज का अंग है, समाज में रहता है। बिना समाज के उसके व्यक्तित्व का विकास संभव नहीं है । समाज की प्रत्येक गतिविधि उसे प्रभावित करती है । एक सजग कलाकार की तरह डॉ. रामावतार ने समाज की विभिन्न स्थितियों के मध्य मानव
के अस्तित्व का रेखांकन किया । संग्रह की प्रत्येक ग़ज़ल कोई न कोई सार्थक संदेश लिए हुए है । लेखक मानव समाज के कल्याण की कामना के प्रति प्रतिबद्ध दिखाई पड़ता है । वह सभी में आपसी सौहार्द और भाई-चारे की भावना के लिए संकल्पित है-“प्यार हो सब दिलों में सभी के लिए । ठौर ना हो किसी विष वमन के लिए ।” इतनी सुन्दर और मानवोपयोगी कृति के लिए मैं कृतिकार को हार्दिक साधुवाद देता हूँ ।

  डॉ. आदित्य कुमार गुप्ता

   वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक ।

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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