साहित्य

जीवित मनुज



क्या चंद सांसों का आवागमन,
ही जीवन कहलाता है।
एहसास हो सब संवेगों का,
तो जीवित मनुज कहाता है
सौ यत्न किए हैं माली ने,
जब तुझ सा पुष्प खिला होगा।
इस मनुज रूप में आने का,
कोई तो लक्ष्य मिला होगा।
इस स्वर्ग सरीखी पृथ्वी पर,
पग तूने मनुज धरा होगा।
जग के महकते उपवन में,
ख्वाबों का चमन हरा होगा।
जो पूर्ण करे संकल्पों को,
वो ही जीवित कहलाता है।
एहसास हो सब संवेगों का,
तो जीवित मनुज कहाता है।
कुछ स्वयं बनाते पथअपना,
कुछ अनुसरण ही करते हैं।
कुछ बैठे हुए घौसलों में,
कुछ उन्मुक्त उड़ानें भरते हैं।
परवाज़ वही कर पाते हैं,
ख़ुद पे जो भरोसा करते हैं।
मंज़िलें उन्हीं को मिलती हैं,
जो दम लाशों में भरते हैं।
उनके कदमों में झुके गगन,
वो ही विजयी कहलाता है।
एहसास हो सब संवेगों का,
तो जीवित मनुज कहाता है।
यह जड़ चेतन का फर्क हमें मजबूर है करता उड़ने को।
चलो ख़्वाब बुनो,तैयार रहो इस खुले गगन में उड़ने को।
राहें अभिनंदन करने को, देखो कितनी सब आतुर हैं।
जीवन का मंत्र फूंकने को,सब देखो कितने व्याकुल हैं।
रेखा यह ज़माना सदियों तक बस गीत उसी के गाता है।

रेखा रानी
विजय नगर ,गजरौला
जनपद अमरोहा, उत्तर प्रदेश।

50% LikesVS
50% Dislikes

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!