साहित्य

तू ही दीनानाथ

विजय “तन्हा”

मैं बालक अज्ञान हूँ बाबा, रखना मेरा ध्यान।
पाप पुण्य को मैं ना जानू मैं तो हूं अनजान।

शिव शंकर है कोई कहता, कोई भोले नाथ।
परमपिता है तू ही जग का, तू ही दीनानाथ।
जगपालक है, तू ही करता पूरे सब अरमान।
मैं बालक अज्ञान हूँ बाबा – – – –

तू है बडा दयालू बाबा, सबके मनकी सुनता।।
तेरे दर पर आकर जो भी, तेरे सपने बुनता।
तू ही देता सबको जग में, मान और सम्मान।
मैं बालक अज्ञान हूँ बाबा – – – –

धन दौलत है आनी जानी, जितना भी वो आवे।
रूप रंग तो ढल ही जाना, वो क्या हमें लुभावे।
हमको तो बस सुमिरन भावे, जिसमें है कल्याण।
मैं बालक अज्ञान हूँ बाबा – – – –

मैं क्या मांगू तुमसे बाबा, तुम हो अंतर्यामी।
घट घटवासी भोले बाबा, तुम हो सबके स्वामी।
दया की दृष्टि बनाए रखना, मैं मागूँ वरदान।
मैं बालक अज्ञान हूँ बाबा – – – –

       विजय "तन्हा" 
 संपादक - "प्रेरणा" पत्रिका
   पुवायाँ, शाहजहाँपुर  
     9044520208
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