साहित्य

दिल्ली की सर्दी

संध्या नन्दी


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दिल्ली की सर्दी
यूँ जैसे नवजात शिशु के गुलाबी कोपल
यूँ जैसे किशोर – किशोरियों के गुलाबी गाल

दिल्ली की सर्दी
यूँ जैसे ससुराल जाती नववधू रखती पग संभल-संभल कर
यूँ जैसे प्रेमी के बांहो में लरजता प्रेयसी का तन – मन

दिल्ली की सर्दी
यूँ जैसे प्रथम परिणय के समय हाथ में षोडशी की हथेली
यूँ जैसे मुंह में से निकलते भाप में खोता जाता सर्वांग

दिल्ली की सर्दी
यूँ जैसे प्रथम रात को दुल्हा – दुल्हन की कांपती आवाज
यूँ जैसे परिणय बेला में सुलगता बदन

दिल्ली की सर्दी
यूँ जैसे बर्फ के शिला के अंदर धधकती लौ
यूँ जैसे शीशे के बाहर घना होता जाता वास्प्

दिल्ली की सर्दी
यूँ जैसे वृक्ष के तरू से हौले – हौले लुढ़कता – जमता ओसकण
यूँ जैसे सरोजदल के ऊपर थरथराती शबनम

दिल्ली की सर्दी
यूँ जैसे बार – बार कोहरे में खोना और उससे बाहर आना
यूँ जैसे बच्चो के सी-साॅ में कभी ऊपर तो कभी नीचे आना

दिल्ली की सर्दी
यूँ जैसे छुई-मुई के पत्तो का स्पर्श के स्पंदन से सिमटना
यूँ जैसे वृक्ष से झरता हरसिंगार के फुल

दिल्ली की सर्दी
यूँ जैसे नवयुवती के नासिका की रक्तिम अग्रभाग
या यूं उसके तपतपाते लाल पड़ते कनपट

दिल्ली की सर्दी
कभी लगती वर्फ के गोले सी
कभी लगती हल्की रूई के फाहे जैसी

दिल्ली की सर्दी
समेटे अपने में कई रंग , कई रूप
पर फिर भी सबको मोहे , अंजुर भर – भर कर सोहे

अप्रकाशित, अप्रसारित, स्वरचित एंव मौलिक काव्य रचना

संध्या नन्दी
नई दिल्ली

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