साहित्य

दीपक

सलोनी कुमारी

दीपक घनघोर तिमिर में
जन्म लेकर उन्नति करते हैं,

नहीं पलते हैं सदा
किसी के आँचल में छिप कर,

किसी सुकुमारी के हथेली से निकल
जलते हुए तन में,

लाड से पुचकारे जाते हैं
फ़िर भेजे जाते हैं रन में,

संकल्प की आभा तेज आशाओं की
अभिलाषाओं का चमकते हैं,

तन और मन ऐसा के सौ सावन के बूँद
यहाँ दीपक पर नित- नित बरसते हैं।

        सलोनी कुमारी
        बिहार,  दरभंगा

रचना स्वरचित मौलिक और अप्रकाशित है

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