साहित्य

दीपपर्व की सार्थकता

मनीषी सिन्हा

दीप अवलियों  की  प्रखर ज्योत से
चकित अमावस का  भी अंधियारा
पर दीपपर्व की सार्थकता तभी जब
समन्वय सद्भाव का  हो  उजियारा !

पारिवारिक  त्योहार  के उल्लास से
तरंगित सबकी  मन की अभिलाषा
पर दीपपर्व की सार्थकता तभी जब
हृदय में हो स्नेह संवेदना की भाषा !

सुख समृद्धि सौभाग्य के प्रकाश से
घर आंगन जगमगाता जैसे सितारा
पर दीपपर्व की  सार्थकता तभी जब
किसी  दीन कुटिया का  बने सहारा !

तमस विनाशक ज्ञान रूपी दीपक से
रौशन संस्कृति समृद्ध परंपरा आधार
पर दीप पर्व की सार्थकता तभी जब
वंचितों को मिले शिक्षा का अधिकार !

परहित अर्पण करते लौ की ज्योति से
शुभ संकल्प आशा विश्वास का उदय
पर दीप पर्व की  सार्थकता तभी जब
लोकभावन  विचारों का हो अभ्युदय !

विनीत लघु दियों के अथक प्रयास से
होता संभव ज्योतिर्मय संसार बनाना
पर दीप पर्व की सार्थकता तभी जब
सीखें संकल्पित दिया अंतस में जलाना !

                      — मनीषी सिन्हा
                     गाजियाबाद उ० प्र०

यह स्वरचित , मौलिक अप्रकाशित रचना है

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