साहित्य

दीपावली

विजया गुप्ता

फुटपाथ पर एक टाट बिछाये
लेकर मिट्टी के कुछ दीये
बैठा है एक आठ नो वर्ष का बालक
मलिन मुंह,उलझे बाल
बिना बटन की कमीज़
चेहरे पर पसरी उदासी ।

कर रहा है प्रतीक्षा किसी ग्राहक की
जो खरीद ले उसके दीये
ताकि वह भी मना सके दीवाली
घर मेंं प्रतीक्षा करती छोटी बहन
एक गुड़िया के लिए मचलती
और उसे भी तो छुड़ाने हैं पटाखे
बोतल बम, चरखी, सुर्री।

कुछ कदम आए उसकी ओर
नयनों में आशा के दीप जले
बैठ गया वह कुछ तन कर
पर नहीं, वे कदम बढ़ गये आगे
झिलमिल करती चाइनीज झालर की ओर
कहते सुना उसनेे उनको

“अरे कौन करे इतना झंझट
तेल और बत्ती का
और फिर हवा का एक झोंका ही तो
बुझा देता है पल भर में दीया
और ये रंगीन बल्बों की झालरें
जगमगाएंगी घर को सारी रात
सुनते ही बोल
दप से बुझ गये उसकी उम्मीद के दीये
अंधेरी हो गयी उसकी दीवाली।

इधर थोडी़ दूर पर बैठी उसकी मां
 है टोकरी में कुछ लक्ष्मी गणेश की अनगढ़ मूर्तियां

लिए बैठी है सुबह सेआस लगाए
पर नहीं बिक पाईं चार भी
क्योंकि उसकी बगल में ही
एक ऊंची दुकान में
सजे हैं एक कतार में
बहुत से लक्ष्मी गणेश
जो हैं चाइनीज
सुंदर भी हैं और आकर्षक भी
बिक रही हैं मूर्तियां
खनक रही है लक्ष्मी।

ओह! कितना अंतर है दोनो की दीवाली में
एक की दीवाली होगी रंगीन झिलमिलाती
और दूसरी,आंसुंओं से भरी उदास!!!

विजया गुप्ता
मुजफ्फरनगर
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