साहित्य

दीपावली

संध्या चतुर्वेदी

दीपावली पर्व पर बच्चों को उपहार देना और कुछ धनराशि देना हमारी पुरानी परम्परा है क्योंकि जिस घर के बच्चों के चेहरे पर मुस्कान होगी ,माँ लक्ष्मी उन पर जरूरी कृपा दृष्टि देंगी।
कोई भी माँ हो अपने बच्चों को खुश देखना चाहती है। तो उस के लिए झूठ की आवश्यकता नही, बच्चों के भगवान तो माँ पिता ही होते है और माँ लक्ष्मी बच्चों के भाग्य की धनराशि जरूर देतीं है तो अपने बच्चों को अपनी सभ्यता का स्वरूप और कारण जरूर बताये। उन्हें अवगत कराये की किस प्रथा के पीछे कारण क्या है।
दीपावली को राम चन्द्र जी अयोध्या लौटे थे और अयोध्या वासियों ने उनके स्वागत में दीप जलाये थे ये बात तो सब को पता है।
पर उस से भी पहले जब देवता और असुरों द्वारा समुंद्र मंथन हुआ था तो धन तेरस के दिन धन्वन्तरि देव हाथ मे अम्रत कलश ले कर समुद्र से प्रगट हुए थे।
धन्वन्तरि देव भगवान विष्णु के अवतार हैं और पहले आयुर्वेद के देव थे ,यानी कि सनातन धर्म में त्रेता युग से आयुर्वेद का अनुसरण किया जाता है।
इस मंथन से में समुद्र से माँ लक्ष्मी भी निकली थी जिन्होंने भगवान विष्णु को वरण किया था।
जो कि यह बताता है कि सनातन काल मे स्त्रियाँ अपनी इच्छा से अपने लिए वर को चुनती थी और सभी उस का सम्मान भी करते थे।
इसलिये माँ लक्ष्मी द्वारा विष्णु को पति रूप में वरण करने पर देवता और असुर किसी ने भी इस का विरोध नही किया और हम आज भी दीपावली के पर्व पर श्री विष्णु और माँ श्री लक्ष्मी दोनो का पूजन करते है और कामना करते है कि हमें स्वास्थ्य और सम्पति दोनो ही प्राप्त हो ।
जिस प्रकार पति के बिना पत्नी का किसी के घर मे निवास करना सम्भव नही ,उसी प्रकार पति श्री विष्णु के बिना लक्ष्मी माँ नही आती ।
तो बच्चों को ये सब कथायें सुनाये और उन का ज्ञान वर्धन करें।
पहले के जमाने में ये सब शिक्षा गुरुकुलों में दी जाती थी।
हमारे ग्रन्थों में आज भी इन कथाओं का वर्णन मिलता है।
पर आज जहाँ बच्चों के लिए गुरुकुल है ना ही आज की शिक्षा में सनातन धर्म के ग्रन्थों का कोई भी स्थान नही।
तो ऐसे में बच्चे किस से ये ज्ञान प्राप्त कर पाएंगे।
उन के पास आधुनिक विज्ञान से समय ही नही मिलता इस ज्ञान को जानने के लिए।
बिन सत्संग विवेक न होई।
आज सत्संग मे जाने का समय किस के पास है और दूसरी की आज के सत्संग ने भी आधुनिकता का रूप ले लिया है।
सूक्ष्मता और आकर्षक ने सत्य से सब को दूर कर दिया है।

मेहनत कर के मेहनताना देना तो एक बाल अपराध है जो कानूनन अपराध भी है, तो उन को साथ मे हाथ बटाना जरूर सिखाये पर स्वार्थ या लालच से नही बल्कि किसी की भी सहायता करने के उद्देश्य से।
रही बात सेंटा को भूलने की तो भाई बच्चे वो सीखते है जो आप उन्हें सिखाते हैं।
हम ना तो क्रिसमस मनाते है न हमारे बच्चे किसी सेंटा का इंतजार करते है।

अपने धर्म को जरूर बढ़ाये और बच्चों को उन की भाषा मे ही समझाये।
इस दीपावली को दीपावली का महत्व समझाये और अपनी संस्कृति को बचाये।

माँ लक्ष्मी तो जगत माता है।
माँ सब को ऐश्वर्य और सम्पन्नता दें।
सब के दुख दूर करें।
अपनी प्रार्थना में सभी के लिए खुशियाँ माँगे।
वासुदेव कुटुम्बकम
जय माँ लक्ष्मी

संध्या चतुर्वेदी

मथुरा,उप

100% LikesVS
0% Dislikes

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Back to top button
error: Content is protected !!