साहित्य

दीप एक जलाते जाना है

डॉ सुनील कुमार परीट

यारों मन की अज्ञानता को
अब दूर करते जाना है ।
तिमिर से रोशनी के लिए
दीप एक जलाते जाना है ।।

रिश्तों में उलझने आई है
सब को सुलझाते जाना है ।
रिश्तो में अटूट नाता हो
तो दीप एक जलाते जाना है ।।

शिक्षा व्यापार बन गया है
उसे उचित बांटते जाना है ।
शिक्षा को पवित्र रखना है
तो दीप एक जलाते जाना है ।।

राजनीति षड्यंत्र बन गया है
सार्वत्रिक सेवा करते जाना है ।
राजनीति एक सेवा मात्र हो
तो दीप एक जलाते जाना है ।।

किसान कोई खिलवाड़ नहीं है
उसकी भलाई करते जाना है ।
अन्नदाता को नमन करना है।
तो दीप एक जलाते जाना है ।।

दीन दलितों से खेला जाता है
उनमें परमात्मा देखते जाना है ।
उनके प्रति समर्पित रहना है
तो दीप एक जलाते जाना है ।।

यह राष्ट्र हमारा अभिमान है
सब न्योछावर करते जाना है ।
अब दिल में राष्ट्र बसता है
तो दीप एक जलाते जाना है ।।

डॉ सुनील कुमार परीट
बेलगांव कर्नाटक
वरिष्ठ हिंदी अध्यापक एवं साहित्यकार

यह मेरी स्वरचित एवं मौलिक रचना है सर्वाधिकार सुरक्षित।

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