साहित्य

दूर बहुत है जाना

अनुपम चतुर्वेदी

उठ जाग मुसाफिर , दूर बहुत है जाना,
आगे बढ़ते रहना है,पड़े न फिर पछताना।

माना बहुत कठिन राह है, छाले पांव पड़ेंगे,
मिल जाएगी मंज़िल, सफ़र बनेगा सुहाना।

कंकड़-कंकड़ पैदल चलकर नदिया बहती,
तन छिलकरभी न भूली,अमृत जल बरसाना।

ठण्डी,गर्मी,वर्षा सहकर भी, हरे-भरे रहते हैं,
फिरभी कभी नहींभूले,फल पाकर झुकजाना।

फिर हिम्मत क्यों हारें हम,ठान लें अपने मन में,
हर हाल में आगे बढ़ते जाना,बस बढ़ते जाना।

अनुपम चतुर्वेदी

, सन्त कबीर नगर, उ०प्र०
रचना मौलिक, सर्वाधिकार सुरक्षित
मोबाइल नंबर-९९३६१६७६७६

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