साहित्य

दोहे अमित के

अमित शिवकुमार दुबे

अंतस से संतुष्ट यदि,जगत लगे परिवार।
वरना घर ही रण सजे,मचता हाहाकार।।

रोक कौन पाया यहाँ ,नद का प्रबल प्रवाह।
आगे वह बढ़ ही गया , जिसकी उत्कट चाह।।

वक्त नहीं रुकता कभी,सदा रहे गतिमान।
जग विस्तृत-तय उम्र है, रखना हरपल ध्यान।।

माटी से नफरत हुई,माटी से ही नेह।
माटी में मिलती रही,यह माटी की देह।।

बुरा लगा यदि मैं कभी , कहना निःसंकोच।
संभव जो होगा अमित , बदलूँगा निज सोच।।
■अमित शिवकुमार दुबे
एस्टर,बाफना मिडोस,पालघर
8007619524

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