साहित्य

दोहे

सुषमादीक्षितशुक्ला

दोहे
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सुनु आया मधुमास सखि,
लगा हृदय बिच बाण ।
सिर्फ देह है सखि यहाँ ,
प्रियतम ढिंग है प्राण ।।

किसके हित सँवरूं सखी,
किस पर करूं सिंगार।
बाट निहारुं रात दिन ,
पिय नहिं सुनत पुकार।।

ऋतु बासन्ती सुरमई ,
पिया मिलन का दौर ।
पियरी सरसों खेत में ,
बगियन में हैं बौर ।।

यह कैसो मधुमास सखि,
जियरा चैन न पाय ।
नैनन से आंसू झरत ,
उर बहुतहि अकुलाय ।

पिय कबहूँ तो आयंगे ,
वापस घर की राह ।
बाट निहारूँ दिवस निसि ,
उर धरि चाह उछाह ।।

सबके प्रियतम संग हैं ,
मोरे हैं परदेस।
जियरा तड़पत रात दिन ,
यही हिया में क्लेष ।।

मन मेरो पिय संग है,
भावे नहिं घर-ठौर ।
वह दिन सखि कब आइहैं
पिय बनिहैं जब मौर ।

रात दिवस नित रटत हूँ,
मैं उनही को नाम ।
वो ही मेरे चैन- सुख ,
वो ही चारोंधाम ।।

डर लागत है सुनु सखी ,
पिय भूले तो नाह ।
हम ही उनकी प्रेयसी ,
हम ही उनकी चाह।।

ऋतु बासंती सुनु ठहर ,
जब लौं पिया न होय ।
कोयल पपिहा से कह्ये
शोर करै नहिं कोय ।।

सुषमा दिक्षित शुक्ला

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