कवितासाहित्य

“नृत्य”

__सुषमा श्रीवास्तव

नृत्य  वह आराधना है,जो तन-मन मष्तिष्क को दे ऐसा मोड़,
इस आराधना के भाव करें आराध्य का नमन,वंदन और आह्वान कर जोड़।
नृत्य है एक ऐसी कला जिसका न कोई मेल,
नृत्य है एक ऐसी कला जो बच्चों का ना खेल।
लोगों के दिलों में बसता जिसका है, थोड़ा टेढ़ा मेढ़ा रास्ता ,
मेहनत और अभ्यास से इसकी खूबसूरती निखारता।
विभिन्न राज्यों की है पहचान और देश की है शान,
हौसले अगर रखो बुलंद तो आएगा इसका ज्ञान।
अब बस करो आँखें बंद रखो अटूट विश्वास,
नृत्य कला का होगा बोध बस करो अब इंद्रियों का विकास।
तन प्रफुल्लित मन प्रफुल्लित नृत्य के समागम में,
स्फूर्ति, स्वास्थ्य और विकास की राह है नृत्य के आगम में।


रचयिता – सुषमा श्रीवास्तव,
मौलिक भाव, रुद्रपुर, उत्तराखंड।

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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