साहित्य

नेह का बिछौना

रीमा सिन्हा

कहते हैं जिन्हें याद करो,वे सपनों में नज़र आते हैं।
माँ,पर तुम्हें देखने को नैन मेरे तरस जाते हैं।
यदि होता है पुनर्जन्म तो आकर मुझे समझा दो न,
यदि ईश चरणों में लीन हो तो आकर मुझे बतला दो न।

ऐसे कैसे तुम चली गयी हर रोज़ बात करती थी,
अपनी बेटी को बिन कॉल किये न रहती थी,
अब क्या हो गया तुम्हें,जो सपनों में भी न आती हो?
अपनी मीठी बोली माँ अब क्यों नहीं सुनाती हो?

सिर्फ और सिर्फ तुमपर ही लिख रही,
वे सारी बातें जो रह गई थी अनकही।
लोग मुझे समझाते हैं ढाढस बंधाते हैं,
कहते हैं मैं तो स्वयं बच्चों की माँ हूँ,
सोचूँ उनका जिनकी माँ बचपन में चली जाती हैं,
अनाथ हो जाते बच्चे वे लौट कर न आती हैं।
कैसे उन्हें मैं समझाऊँ मैं भी अनाथ ही हो गयी हूँ,
भले ही बच्ची नहीं मैं,पर तुम बिन खो गयी हूँ।

दुनियां के इस मेले में आँचल का इक कोना दे दो,
माँ, सपनों में ही सही मुझे नेह का बिछौना दे दो।
रीमा सिन्हा
लखनऊ-उत्तर प्रदेश

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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