साहित्य

पंच दिवसीय दीप पर्व

गीता पांडेय “अपराजिता”

पंच पर्वों का बीता त्यौहार,
खुशियांँ मनाये सभीअपार।
आस विश्वास भरे उल्लास को,
बना संस्कृति का जोआधार।।

कुबेर लक्ष्मी त्रयोदशी आते ,
मनभर आशीष सदा पाते ।
खरीदकर झाड़ू बर्तन लाते ,
दुःख दरिद्रता दूर भगाते ।
आरोग्य संपदा वैभवअपार,
पंच पर्वों का बीता त्यौहार।।

चौदस को नरकच तुर्दश कहते,
प्रभु नरकासुर को हैं बधते।
दीपजला सब जन वंदन करते,
यमदेव का ध्यान भी धरते।
फैल जाता है जग में उँजियार,
पंच पर्वोंका बीता त्यौहार।।

दीपमालाओं से था प्रकाशित,
अवध संग में ये जग सारा।
अभिलाषाओं की फुलझड़ियों को,
छोड़ा घर आंँगन अरु द्वारा।
किया कल्पनाएं सभी साकार,
पंच पर्वों का बीता त्यौहार।।

परेवा घमंड तोड़ इंद्र का,
प्रकृति महत्त्व रहे समझाए ।
उंँगली पर उठा लिए गोवर्धन,
ब्रजवासियों को प्रभु बचाए।
महिमा उनकी हैअपरंपार,
पंच पर्वों का बीता त्यौहार।।

श्रेष्ठआजीविका स्रोत होता है,
प्रतिदिनअन्नकूट होता है।
भाई बहन में जब सौहार्द हो,
हर दिन भैया दूज होता ।
अद्भुत बना दोनों का है प्यार,
पंच पर्वो का बीता त्यौहार।।

करती गीता सबसे है विनती,
रखना सुरक्षितअपना देश।
दया,त्याग,ममता सहिष्णुता भर,
परोपकार का हो परिवेश।
जातिधर्म का नहीं करो प्रचार,
पंच पर्वोंकाबीता त्यौहार।।

स्वरचित मौलिक व अप्रकाशित रचना
गीता पांडेय “अपराजिता”

रायबरेली उत्तर प्रदेश

50% LikesVS
50% Dislikes

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Back to top button
error: Content is protected !!