साहित्य

पंच दिवसीय पर्व

संगीता श्रीवास्तवा

पंच दिवसीय पर्व है अपना ,अद्भुत इसके प्रथा विचार।
अलग-अलग हर दिन पूजा है, फिर भी अलग नहीं है भाव।
उनके भी भाव हम समझे,जिनसे सजता यह त्योहार।
दीपक ने पहले ही कह दिया मैं हूं
उजाला देहरी का।
मेरे बाद ही तुम सब हो फैसला मैंने
यही किया।
मैं घर के कोने-कोने और छज्जों पर सजता हूं।
देखो हूं नन्हा सा फिर भी तम को पटकनी देता हूं।
तब धीरे से तेल ने अपनी बात, बाती से कह डाली।
दिया हंसा,सच है तुम सब बिन,मैं नहीं मेरी बात नहीं।
बस यही भाव घर परिवार को सुख समृद्धि से देता भर।
राकेट बम की अपनी है शान,उसे है छूना आसमान।
फुलझड़ियां खिलखिला रही, हमसे ही है इनकी उड़ान।
भाई मेरे बहुत बड़े हो छूलो-छूलो तुम आकाश।
पर हमसे है रौनक घर की,इतना तो तुम लो ही मान।
लगे ठहाके सभी लगाने, सचमुच हो तुम घर की मुस्कान।
अन्त मे आए राजा मिष्ठान, सुन-सुन प्रमुदित थे सबकी बात।
सब अपनी अपनी कह लो ,मेरे बारे मे है अपनी अलग ही राय।
मैं जब तक मुह मे घुलूं,फीका-फीका
है त्योहार।
मेरे बिना तो पूर्ण ही नहीं, हो सकता है ये त्योहार।
काश!कि इन्सानों मे भी, होता ऐसा भाव,प्रेम सौहार्द।

       संगीता श्रीवास्तवा

वाराणसी ,यू. पी.

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