कवितासाहित्य

पर इश्क था वो मेरा

एक सुहानी शाम बेच कर
सहर का आफताब लाई हूं।
समझौते की मंजिल को छोड़कर
रास्तों से चुन अपने अधुरे ख्वाब लाई हूं।।

मुकद्दर ने कई मर्तबा देने से इंकार किया है
पर इश्क था वो मेरा ,
मिलेगा जरूर मैने भी एतबार किया है।

आबशार सी मंजिल को कैसे
आतिश की माशूका अपना घर बनाती?
रिवायती चोंचलो को कुबुल कर
अधुरे ख्वाब कैसे मुकम्मल कर पाती?

बस इसी कश्मकश को दूर करना था,
जिससे इतिहास में कुरबतें थी,
अब वापस उसे करीब करना था।

मैंने एक अधुरे किस्से का आगाज़ किया था,
जिससे मुकम्मल ख्वाब के अंजाम तक पहुंचना था,
कोई शिकस्त नही , वो मेरी जीत का फसाना था।।

@भव्या कृति

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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